Thursday, May 7, 2015

मीडिया जमीन से जुड़े, नई तकनीक अपनाए:

मीडिया जमीन से जुड़े, नई तकनीक
अपनाए: आलोक तोमर स्मृति विमर्श

प्रभासाक्षी  21 मार्च 2015    नई दिल्ली

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छोटे शहरों के उपेक्षित लोगों की आवाज उठाने वाले पत्रकारों की संख्या तेजी से सिकुड़ रही है। इसे गंभीरता से लेना होगा, तभी पत्रकारिता जिंदा रहेगी। इंटरनेट युग में पारंपरिक मीडिया के सामने नई किस्म की चुनौतियाँ सामने आ रही हैं जो कन्टेन्ट से लेकर डिलीवरी और विज्ञापनों से लेकर प्रॉडक्शन के स्तर तक हैं। इन्हें अनदेखा करना कुछ वर्ष बाद उसके लिए बड़ा संकट पैदा कर सकता है। यह बात आलोक तोमर के चौथे स्मृति विमर्श पर वक्ताओं ने कही। शुक्रवार को कांस्टीट्यूशन क्लब में इस बाबत एक परिचर्चा का भी आयोजन किया गया था, जिसमें राजनीति से लेकर मीडिया के कई अहम लोगों ने अपने विचार रखे।

परिचर्चा 'भविष्य के मीडिया की चुनौतियाँ' विषय पर हुई जिसमें केंद्रीय इस्पात और खान मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी, सांसद केसी त्यागी, प्रभात झा और डीपी त्रिपाठी, शिक्षाविद् निशीथ राय, बीबीसी हिंदी के संपादक निधीश त्यागी, प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच, टेलीविजन पत्रकार दीपक चौरसिया ने अपने विचार रखे। संचालन भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रो. आनंद प्रधान ने किया। कार्यक्रम में आलोक तोमर की पत्नी सुप्रिया भी मौजूद थीं। अन्य उपस्थित लोगों में आज तक के प्रबंध संपादक सुप्रिय प्रसाद, जनसत्ता के संपादक ओम थानवी, टेलीविजन पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी, शैलेष, मुकेश कुमार, अनुरंजन झा, चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय, प्रसिद्ध लेखिका पद्मा सचदेव, मीडिया वेबसाइटों के संपादक यशवंत सिंह, पुष्कर पुष्प आदि शामिल थे।

इस मौके पर इस्पात और खान मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने आलोक तोमर के साथ अपने संबंधों का जिक्र किया और हाशिए के लोगों की आवाज उठाने की अपील की। प्रभात झा ने मीडिया की चुनौतियों को पत्रकार की अपनी समस्याओं और सीमाओं से जोड़ा। उनका कहना था कि पत्रकार खुद जीवन यापन की समस्या से जूझ रहा है और तमाम तरह के दबावों में काम कर रहा है ऐसे में सिद्धांतों पर टिके रहना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। उन्होंने इन हालात को बदलने की अपील की। पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने पत्रकारिता के मौजूदा दौर से संबंधित अनेक चुनौतियों का जिक्र किया और कहा कि पिछली सरकार ने ऐसे कई कदम उठाए थे जिनसे विज्ञापनों पर टेलीविजन पत्रकारिता की निर्भरता कम होती। यह उसे बाहरी प्रभावों से मुक्त करने की दिशा में अहम कदम था। उन्होंने कहा कि डीटीएच प्रणाली की स्थापना से टेलीविजन चैनलों को विज्ञापनों से अलग भी आय अर्जित करने का एक मजबूत जरिया हासिल हुआ है।

टेलीविजन पत्रकार दीपक चौरसिया ने कुछ वक्ताओं के इस आकलन से अहसमति जताई कि आज की पत्रकारिता जमीन से जुड़े मुद्दों से दूर होती जा रही है और गरीब तथा उपेक्षित व्यक्ति के लिए संघर्ष करने को कोई तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि आज भी पत्रकारिता जन-सरोकारों से जुड़ी है। वह बाहरी दबावों (आर्थिक या राजनैतिक) से मुक्त रहते हुए काम करने में सक्षम है। इस सिलसिले में उन्होंने बदायूं की दो लड़कियों की हत्या/आत्महत्या की घटना का जिक्र किया जिसे उभारने में मीडिया की अहम भूमिका रही।

प्रभासाक्षी के समूह संपादक बालेन्दु शर्मा दाधीच ने कहा कि मीडिया के सामने मौजूद चुनौतियों पर चर्चा करते समय हम प्रायः सैद्धांतिक और आदर्शवादी पक्षों में अधिक उलझ जाते हैं और उन व्यावहारिक चुनौतियों को अनदेखा कर देते हैं जो भविष्य में उसके लिए संकट पैदा कर सकती हैं। कार्यक्रम के मूल विषय 'भविष्य के मीडिया की चुनौतियाँ' पर बोलते हुए श्री दाधीच ने कहा कि वैकल्पिक मीडिया का उभार प्रिंट और टेलीविजन दोनों के लिए आने वाले दिनों में बड़ा खतरा सिद्ध होने वाला है। उन्होंने अमेरिका में सन् 2009-10 के दौर में बडी संख्या में अखबारों के बंद होने का जिक्र करते हुए कहा कि ऑनलाइन मीडिया पारंपरिक समाचार माध्यमों के पाठक और विज्ञापन दोनों को आकर्षित करने में सफल हो रहा है।

श्री दाधीच ने कहा कि भारत में अभी इसका विशेष प्रभाव दिखाई नहीं दिया है जिसके लिए भारतीय अखबारों की प्रशंसा की जानी चाहिए। अलबत्ता, भारत का प्रिंट मीडिया यदि डिजिटल मीडिया के प्रभाव से बचने में सफल रहा तो उसमें देश में इंटरनेट और तकनीकी माध्यमों का अधिक प्रसार न होना भी एक बड़ा कारण है। जैसे-जैसे यह स्थिति बदलेगी, डिजिटल माध्यमों की चुनौती बड़ी होती चली जाएगी। उन्होंने कहा कि टेलीविजन को भी देर सबेर डिजिटल माध्यमों की चुनौती का सामना करना पड़ेगा क्योंकि इंटरनेट ने वीडियो कन्टेन्ट की डिलीवरी के तरीके बदलने शुरू कर दिए हैं। अब एक नई किस्म का वीडियो कन्टेन्ट और नई तरह के इंटरनेट आधारित वीडियो प्लेटफॉर्म उभर रहे हैं जो पारंपरिक मीडिया के लिए खतरा पैदा करने में सक्षम हैं। बालेन्दु ने विज्ञापनों के क्षेत्र में आ रहे बदलावों का भी जिक्र किया और कहा कि ऑनलाइन विज्ञापन प्लेटफॉर्म न सिर्फ विज्ञापनदाता बल्कि दर्शक/पाठक के भी हितों के अनुकूल हैं और टेलीविजन जैसे पारंपरिक माध्यम लंबे समय तक पुराने तौर तरीकों पर आश्रित नहीं रह सकते। इस परिस्थिति का सामना करने के लिए इनोवेशन की तरफ बढ़ने की जरूरत है और नए मीडिया के साथ आने की जरूरत है।

बीबीसी हिंदी के संपादक निधीश त्यागी ने कहा कि आज के पत्रकारों को भाषा पर ध्यान देने की बेहद ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि सही वाक्य न लिख पाने वाले पत्रकारों की पूरी की पूरी पीढ़ी मीडिया के अस्तित्व के लिए बहुत बड़ी भावी चुनौती सिद्ध होने वाली है।

कार्यक्रम के दौरान भारतीय जनसंचार संस्थान के दो छात्रों नंद राम प्रजापति और आशीष कुमार शुक्ला को आलोक तोमर फेलोशिप प्रदान की गई। लखनऊ स्थित शकुंतला देवी पुनर्वास विश्वविद्यालय के उप कुलपति निशीथ राय ने हिंदी विभाग के टॉपर छात्र को आलोक तोमर स्मृति स्वर्ण पदक देने की घोषणा की।

नेट निष्पक्षता पर गंभीर बहस की जरूरत: कार्णिक

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नई दिल्ली (संवाददाता)- इंटरनेट सबका अधिकार है और सभी तक इसकी पहुंच सुलभ होनी चाहिए। नेट न्यूट्रलिटि (नेट निष्पक्षता) आज एक ज्वलंत मुद्दा है जिस पर गंभीर और सार्थक बहस की अत्यंत आवश्यकता है। यह विचार दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (डीजेए) के तत्वधान में आयोजित परिचर्चा में मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए वेब दुनिया के संपादक जयदीप कार्णिक ने व्यक्त किये। उन्होंने इस विषय में ट्राई की वर्तमान भूमिका पर सवालिया निशान लगाते हुए सरकार से उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने की मांग की।
डीजेए के जंतर मंतर रोड पर स्थित कार्यालय में आयोजित इस परिचर्चा में बड़ी संख्या में पत्रकारों, वेब पोर्टल संचालकों और पत्रकारिता विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। डीजेए के अध्यक्ष अनिल पांडे तथा महासचिव आनंद राणा ने उपरोक्त विषय पर जल्द ही एक बड़ी बहस कराने का आश्वासन प्रतिभागियों को दिया। डीजेए के मार्गदर्शक राजेंन्द्र प्रभु, डा नंदकिशोर त्रिखा, रासविहारी और मनोज वर्मा इस मौके पर विशेष तौर पर उपस्थित थे। परिचर्चा का संचालन प्रवक्ताडाटकाम के संपादक श्री संजीव सिन्हा ने किया।
श्री कार्णिक ने कहा कि नेट निष्पक्षता की वर्तमान बहस सर्विस प्रोवाइडरों के द्वारा अपने अपने हित में संचालित कराने की कोशिश हो रही है। जबकि इसमें उपभोक्ता की आवाज को गंभीरता के साथ सुने जाने की जरूरत है। नेट की निष्पक्षता को खत्म करना आम लोगों के हितों पर कुठाराघात होगा।
परिचर्चा में बोलते हुए प्रतिभागियों ने सरकार से नेट निष्पक्षता को बरकरार रखने की मांग की।
http://www.news4city.com/%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%9F-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%AD%E0%A5%80%E0%A4%B0-%E0%A4%AC/

नेता, एंकर और जोकर / डॉ. वेदप्रताप वैदिक

नेता, एंकर और जोकर
                       डॉ. वेदप्रताप वैदिक

आम आदमी पार्टी के नेता और हिंदी के प्रसिद्ध लोककवि कुमार विश्वास के विरुद्ध आजकल जो अभियान चल रहा है, उसका औचित्य हमारी समझ के बाहर है । जो ‘आप’ कार्यकर्ता पीड़िता मानी जा रही है, उसकी पीड़ा क्या है ? उसकी पीड़ा यह नहीं है कि विश्वास ने उसके साथ कोई आपत्तिजनक बर्ताव किया है बल्कि यह है कि उसके और विश्वास के बारे में झूठी अफ़वाहें उड़ाई जा रही हैं। उस महिला का परेशान होना स्वाभाविक है और उससे भी ज्यादा परेशान अगर कोई होगा तो वह विश्वास होगा। लेकिन आश्चर्य है कि उस महिला ने अपनी परेशानी पुलिस को बताई और खबरचियों को बताई। इससे उसको क्या लाभ हुआ ? जो अफवाह सौ-दो सौ लोगों तक फैली होगी, अब वह लाखों-करोड़ों लोगों तक फ़ैल गई। खबरचियों की चांदी हो गई। वे अपना धंधा कर रहे हैं । उन्हें कोई शर्म-लिहाज़ नहीं है । उनकी बला से कोई आत्महत्या कर ले, तलाक ले ले, किसी की हत्या कर दे। उनका क्या बिगड़ रहा है। वे तितर-बटेर दंगल दिखा रहे हैं, अपनी दर्शक–संख्या बढ़ा रहे हैं और विज्ञापनों से पैसा कमा रहे हैं।

लेकिन आश्चर्य है, मुझे भाजपा और कांग्रेस के नेताओं पर, जो टी.वी.चैनलों के ‘जोकरों’ (एंकरों) से भी बड़े मसखरे सिद्ध हो रहे हैं। वे कुमार विश्वास और अरविन्द केजरीवाल के विरुद्ध प्रदर्शन आयोजित करवा रहे हैं। महिला आयोग से पत्रकार-परिषद् करवा रहे हैं। उन्होंने राजनीति को मसखरी में बदल दिया है । अरविन्द और विश्वास के खिलाफ उनको लड़ना है तो लड़ें, राजनीतिक मुद्दों पर। वे जिस मुद्दे को महिला सम्मान का प्रश्न बना रहे हैं, उससे वे देश की महिलाओं का अपमान ही कर रहे हैं। जो महिला एक अफ़वाह से पीड़ित है, उसकी पीड़ा को उन्होंने हज़ार गुना बढ़ा दिया है।

इस सारे प्रकरण से अरविन्द केजरीवाल का आपे से बाहर हो जाना समझ में आता है।  कल मैंने लिखा था कि हमारे टी.वी. रिपोर्टरों और एंकरों की करामात से नेपाल में हमारी कैसे बदनामी हुई, आज फिर उन्होंने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि चैनलों पर कड़े प्रतिबन्ध लगाना जरूरी समझा जाएगा।यह मांग भी उठ सकती है कि चैनलों को दिन में केवल तीन बार ख़बरें दिखाने की छूट हो और जो वाद-विवाद होते हैं, उनमें यदि कोई भी आपत्तिजनक बात कही जाए और वह अश्लील और अपमानजनक हो तो उसके लिए चैनल के मालिक,प्रधान संचालक, एंकर और वक्ता को समुचित सजा दी जाए। यह चैनल पर निर्भर है कि वे आत्मानुशासन पसंद करते हैं या फिर अपने पर कठोर अनुशासन को आमंत्रित करते हैं।       

{हिंदी-विमर्श:8605} भारतीय मीडिया के डिजिटल प्रयोगों का आधार तैयार है ....बालेन्दु शर्मा दाधीच


ऑनलाइन माध्यमों पर विज्ञापनों की एक बेहद लोकप्रिय पद्धति है जिसे कहते हैं- Pay Per Click। इसके तहत विज्ञापनदाता को विज्ञापन के प्रदर्शन के लिए पैसा नहीं देना होता बल्कि उसे तभी पैसा देना है जब किसी यूज़र ने उसके विज्ञापन को क्लिक किया। यानी वह क्लिक करने के बाद विज्ञापनदाता की वेबसाइट या उसके उत्पाद के पेज तक पहुँचा। टेलीविजन या अखबार में ऐसी व्यवस्था कहाँ है? आप अनुमान लगा सकते हैं कि ऑनलाइन मीडिया की विज्ञापन प्रणाली विज्ञापनदाताओं के लिए ज्यादा लाभप्रद है। इतना ही नहीं, वह ज्यादा परिणामोन्मुखी भी है क्योंकि जब यूज़र विज्ञापन पर क्लिक कर कंपनी के वेब पेज पर पहुँचता है तो वह वहीं पर उत्पाद के लिए ऑर्डर भी कर सकता है। दर्शक के खरीददार के रूप में कनवर्जन की दर यहाँ ज्यादा है। इसलिए अनायास नहीं है कि पश्चिमी देशों में विज्ञापनदाताओं के लिए ऑनलाइन मीडिया ज्यादा पसंदीदा विकल्प बन रहा है। देर-सबेर भारत में भी ऐसा हो सकता है।
एक महत्वपूर्ण रुझान जिस पर कम लोगों का ध्यान गया है, वह है समाचारों के क्षेत्र में तकनीकी कंपनियों की बढ़ती उपस्थिति। याद कीजिए शॉन बोमैन और क्रिस विलिस का वह बयान कि खबरों के गेटकीपर के रूप में पारंपरिक मीडिया की भूमिका खतरे में है। आज दुनिया में खबरों तक पहुँचने का सबसे बड़ा माध्यम अगर कोई है तो वह है गूगल न्यूज, और गूगल कोई मीडिया कंपनी नहीं है बल्कि तकनीकी कंपनी है। यही बात याहू और एमएसएन पर लागू होती है। भारत में रीडिफ और सिफी जैसी कंपनियों के पोर्टल खबरों के सबसे बड़े स्रोतों में माने जाते हैं और ये मूल रूप से मीडिया कंपनियाँ नहीं हैं बल्कि सूचना प्रौद्योगिकी और विज्ञापन कंपनियाँ हैं। नए मीडिया ने खबरों के क्षेत्र को सबके लिए खोल दिया है। इसमें फायदा किसका है और नुकसान किसका, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है।

एक महत्वपूर्ण रुझान जिस पर कम लोगों का ध्यान गया है, वह है समाचारों के क्षेत्र में तकनीकी कंपनियों की बढ़ती उपस्थिति। आज दुनिया में खबरों तक पहुँचने का सबसे बड़ा माध्यम अगर कोई है तो वह है गूगल न्यूज, और गूगल कोईमीडिया कंपनी नहीं है बल्कि तकनीकी कंपनी है। यही बात याहू और एमएसएन पर लागू होती है। भारत में भी रीडिफ इसका उदाहरण है।

डिजिटल माध्यमों की चुनौती टेलीविजन और प्रिंट दोनों के लिए समान है। वह आने वाले दिनों में और गंभीर हो सकती है। लेकिन इसे टालना संभव है। इसका सिर्फ एक तरीका है, खुद को नए दौर के अनुरूप ढालना और इनोवेशन या नएपन की तरफ कदम बढ़ाना। पारंपरिक मीडिया किस तरह नए मीडिया के साथ जुड़ सकता है, इसी में उसकी स्थायी कामयाबी निहित है। न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट और हमारा अपना टाइम्स ऑफ इंडिया समूह इसके अच्छे उदाहरण हैं। डिजिटल मीडिया की चुनौती तब चुनौती नहीं रह जाती जब हम उसके खिलाफ खड़े होने की बजाए उसके साथ खड़े हो जाते हैं और उसकी शक्तियों का अपने विकास के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं।
मीडिया के लिए जरूरी है इनोवेशन
जहाँ तक हिंदी मीडिया का सवाल है, हमने अपने डिजिटल इनोवेशन को ई-पेपर उपलब्ध कराने, अपने अखबार या टेलीविजन चैनल की वेबसाइट बना लेने और मोबाइल एप पर टीवी प्रोग्राम या खबरों की डिलीवरी करने तक सीमित रखा है। यह एक अच्छी शुरूआत ज़रूर है लेकिन पर्याप्त नहीं है। नए माध्यमों का दोहन करने के लिए नई सोच की ज़रूरत है।
इस दिशा में अच्छा काम करने वालों में मुझे दो-तीन समूह दिखाई देते हैं, जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया समूह जो कन्टेन्ट के साथ-साथ सर्विसेज, ई-कॉमर्स और पारंपरिक मीडिया से स्वतंत्र एप्स में सक्रिय है। उसकी कुछ वेबसाइटें और पोर्टल बहुत ही अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, जैसे- Magicbricks.com, Simplymarry.com और TimesJobs.com। उसके कई एप्स भी हैं जिनमें Gaana.com काफी लोकप्रिय है। नेटवर्क 18 समूह जो नई किस्म की वेबसाइटें और सेवाएँ लेकर आया है, इनमें compareindia.com, in.com और tech2.com खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। हिंदुस्तान टाइम्स समूह ने भी कुछ इनोवेटिव प्रयास किए, हालाँकि उसका go4i चल नहीं सका। आज भी उसकी एक वेबसाइट shine.com मौजूद है जो ठीकठाक स्थिति में है।
एक अहम इनोवेशन जो इन दिनों देखने को मिला है, वह है स्टार इंडिया का हॉट स्टार। यह एक वीडियो स्ट्रीमिंग सर्विस है जो मोबाइल एप्लीकेशन और वेबसाइट के जरिए स्टार के लोकप्रिय कार्यक्रमों की स्ट्रीमिंग करती है। यह स्टार के पारंपरिक टेलीविजन चैनलों के बजाए यह ऐप्प वैकल्पिक डिलीवरी माध्यम का इस्तेमाल करता है लेकिन परिणाम क्या है? स्टार समूह के लिए ज्यादा दर्शक तैयार करना। जो कार्यक्रम पहले ही प्रसारित हो चुके हैं उनके लिए नए दर्शक लाना और विज्ञापनों का भी नया प्लेटफॉर्म तैयार करना। भारतीय बाजार इन प्रयोगों के लिए तैयार है।

टी वी पत्रकारिता का स्तर /डॉ. वेदप्रताप वैदिक


(०६.०५.२०१५):
टी वी पत्रकारिता का स्तर
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भूकंप पीड़ित नेपाल की जैसी सेवा भारत ने की है, वैसी किसी भी देश ने नहीं की । हमारे प्रधानमंत्री ने नेपाल के लिए मदद उतनी ही तेजी से दौड़ाई, जितनी तेजी से वह भारत के किसी भी क्षेत्र के लिए दौड़ाते। नेपाल के प्रधानमन्त्री को उनके देश में भूकंप का पता भी हमारे प्रधानमन्त्री के ट्वीट द्वारा चला। भारत सरकार के कर्मचारियों, हमारे राजनयिकों और फौज ने अपने नेपाली भाइयों के लिए अपनी जान लगा दी । इस बहादुरी और इस उदारता के प्रति नेपाल के लोगों ने अपनी कृतज्ञता भी भाव-भीने शब्दों में प्रगट की ।हमारे सैकड़ों नागरिक भी मदद के लिए स्वयं ही नेपाल पहुँच गए लेकिन हमारे टी वी पत्रकारों ने ऐसे कारनामे कर दिखाए कि उनकी वजह से मददगार लोगों को ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले,‘ यह कहना पड़ा। नेपाल की सरकार ने ३४ देशों के उन सभी कार्यकर्ताओं को नेपाल छोड़ने का आदेश दे दिया है, जो भूकंप-पीड़ितों के बचाव के लिए वहाँ गए हुए थे। नेपाल छोड़ने का जो आदेश जारी किया गया है, उसकी भाषा इतनी रूखी है कि आप उसी से अंदाज लगा सकते हैं कि नेपाली जनता और सरकार हमारे टी वी पत्रकारों से कितनी नाराज है।
कई टी  वी चैनलों के रिपोर्टरों ने भूकंप-पीड़ितों के परम कारुणिक दृश्य दिखाए और भयंकर विनाश लीला को भी करोड़ों दर्शकों के सामने  प्रस्तुत कर दिया। इसी के फलस्वरूप नेपाल की सहायता के लिए अनेक देश दौड़ पड़े लेकिन हमारे कुछ टी वी रिपोर्टरों की अति उत्साह और नादानी ने सब किए-कराए पर पानी फेर दिया। कुछ रिपोर्टरों ने काठमांडू हवाई अड्डे पर दादागिरी की और कुछ ने फौज के हेलिकोप्टरों को इस्तेमाल सिर्फ अपनी टी. आर. पी. बढ़ाने के लिए किया। हमारे फौजी भी प्रचार के लालच में फंस गए। नेपालियों का कहना है कि उन टी वी पत्रकारों ने विनाशलीला को किसी टी वी सीरियल की तरह पेश किया। उन्हें पीड़ितों का कष्ट नहीं दीख रहा था। उस कष्ट में से वे रोचक कहानियां निकाल रहे थे। वे भारतीय सहायता को इस तरह से पेश कर रहे थे, जिससे नेपालियों के स्वाभिमान को चोट पहुँचती है।
टी वी पत्रकारिता को बेहद जिम्मेदार और मर्यादित होने की जरूरत है। वह जितनी प्रभावशाली है, उसे उतना ही संतुलित होना चाहिए। किसी भी घटना को चटपटा बनाकर पेश करने की प्रतिस्पर्धा ने उनकी प्रतिष्ठा को पैंदे में बिठा दिया है। यदि टी वी पत्रकारिता इसी तरह चलती रही तो उसके दो परिणाम हो सकते हैं। एक तो आम आदमी उस पर भरोसा करना ही बंद कर दे और दूसरा सरकार को उस पर तरह-तरह के प्रतिबन्ध लगाना पड़ें । ये दोनों स्थितियाँ ही शुभ नहीं है। नेपाल की घटना टी वी पत्रकारिता के गिरते हुए स्तर का स्वतः प्रमाण है।  
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Ved Pratap Vaidik

Monday, April 27, 2015

मीडिया जमीन से जुड़े, नई तकनीक अपनाए: आलोक तोमर स्मृति विमर्श



प्रभासाक्षी  21 मार्च 2015    नई दिल्ली

छोटे शहरों के उपेक्षित लोगों की आवाज उठाने वाले पत्रकारों की संख्या तेजी से सिकुड़ रही है। इसे गंभीरता से लेना होगा, तभी पत्रकारिता जिंदा रहेगी। इंटरनेट युग में पारंपरिक मीडिया के सामने नई किस्म की चुनौतियाँ सामने आ रही हैं जो कन्टेन्ट से लेकर डिलीवरी और विज्ञापनों से लेकर प्रॉडक्शन के स्तर तक हैं। इन्हें अनदेखा करना कुछ वर्ष बाद उसके लिए बड़ा संकट पैदा कर सकता है। यह बात आलोक तोमर के चौथे स्मृति विमर्श पर वक्ताओं ने कही। शुक्रवार को कांस्टीट्यूशन क्लब में इस बाबत एक परिचर्चा का भी आयोजन किया गया था, जिसमें राजनीति से लेकर मीडिया के कई अहम लोगों ने अपने विचार रखे।

परिचर्चा 'भविष्य के मीडिया की चुनौतियाँ' विषय पर हुई जिसमें केंद्रीय इस्पात और खान मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी, सांसद केसी त्यागी, प्रभात झा और डीपी त्रिपाठी, शिक्षाविद् निशीथ राय, बीबीसी हिंदी के संपादक निधीश त्यागी, प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच, टेलीविजन पत्रकार दीपक चौरसिया ने अपने विचार रखे। संचालन भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रो. आनंद प्रधान ने किया। कार्यक्रम में आलोक तोमर की पत्नी सुप्रिया भी मौजूद थीं। अन्य उपस्थित लोगों में आज तक के प्रबंध संपादक सुप्रिय प्रसाद, जनसत्ता के संपादक ओम थानवी, टेलीविजन पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी, शैलेष, मुकेश कुमार, अनुरंजन झा, चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय, प्रसिद्ध लेखिका पद्मा सचदेव, मीडिया वेबसाइटों के संपादक यशवंत सिंह, पुष्कर पुष्प आदि शामिल थे।

इस मौके पर इस्पात और खान मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने आलोक तोमर के साथ अपने संबंधों का जिक्र किया और हाशिए के लोगों की आवाज उठाने की अपील की। प्रभात झा ने मीडिया की चुनौतियों को पत्रकार की अपनी समस्याओं और सीमाओं से जोड़ा। उनका कहना था कि पत्रकार खुद जीवन यापन की समस्या से जूझ रहा है और तमाम तरह के दबावों में काम कर रहा है ऐसे में सिद्धांतों पर टिके रहना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। उन्होंने इन हालात को बदलने की अपील की। पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने पत्रकारिता के मौजूदा दौर से संबंधित अनेक चुनौतियों का जिक्र किया और कहा कि पिछली सरकार ने ऐसे कई कदम उठाए थे जिनसे विज्ञापनों पर टेलीविजन पत्रकारिता की निर्भरता कम होती। यह उसे बाहरी प्रभावों से मुक्त करने की दिशा में अहम कदम था। उन्होंने कहा कि डीटीएच प्रणाली की स्थापना से टेलीविजन चैनलों को विज्ञापनों से अलग भी आय अर्जित करने का एक मजबूत जरिया हासिल हुआ है।

टेलीविजन पत्रकार दीपक चौरसिया ने कुछ वक्ताओं के इस आकलन से अहसमति जताई कि आज की पत्रकारिता जमीन से जुड़े मुद्दों से दूर होती जा रही है और गरीब तथा उपेक्षित व्यक्ति के लिए संघर्ष करने को कोई तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि आज भी पत्रकारिता जन-सरोकारों से जुड़ी है। वह बाहरी दबावों (आर्थिक या राजनैतिक) से मुक्त रहते हुए काम करने में सक्षम है। इस सिलसिले में उन्होंने बदायूं की दो लड़कियों की हत्या/आत्महत्या की घटना का जिक्र किया जिसे उभारने में मीडिया की अहम भूमिका रही।

प्रभासाक्षी के समूह संपादक बालेन्दु शर्मा दाधीच ने कहा कि मीडिया के सामने मौजूद चुनौतियों पर चर्चा करते समय हम प्रायः सैद्धांतिक और आदर्शवादी पक्षों में अधिक उलझ जाते हैं और उन व्यावहारिक चुनौतियों को अनदेखा कर देते हैं जो भविष्य में उसके लिए संकट पैदा कर सकती हैं। कार्यक्रम के मूल विषय 'भविष्य के मीडिया की चुनौतियाँ' पर बोलते हुए श्री दाधीच ने कहा कि वैकल्पिक मीडिया का उभार प्रिंट और टेलीविजन दोनों के लिए आने वाले दिनों में बड़ा खतरा सिद्ध होने वाला है। उन्होंने अमेरिका में सन् 2009-10 के दौर में बडी संख्या में अखबारों के बंद होने का जिक्र करते हुए कहा कि ऑनलाइन मीडिया पारंपरिक समाचार माध्यमों के पाठक और विज्ञापन दोनों को आकर्षित करने में सफल हो रहा है।

श्री दाधीच ने कहा कि भारत में अभी इसका विशेष प्रभाव दिखाई नहीं दिया है जिसके लिए भारतीय अखबारों की प्रशंसा की जानी चाहिए। अलबत्ता, भारत का प्रिंट मीडिया यदि डिजिटल मीडिया के प्रभाव से बचने में सफल रहा तो उसमें देश में इंटरनेट और तकनीकी माध्यमों का अधिक प्रसार न होना भी एक बड़ा कारण है। जैसे-जैसे यह स्थिति बदलेगी, डिजिटल माध्यमों की चुनौती बड़ी होती चली जाएगी। उन्होंने कहा कि टेलीविजन को भी देर सबेर डिजिटल माध्यमों की चुनौती का सामना करना पड़ेगा क्योंकि इंटरनेट ने वीडियो कन्टेन्ट की डिलीवरी के तरीके बदलने शुरू कर दिए हैं। अब एक नई किस्म का वीडियो कन्टेन्ट और नई तरह के इंटरनेट आधारित वीडियो प्लेटफॉर्म उभर रहे हैं जो पारंपरिक मीडिया के लिए खतरा पैदा करने में सक्षम हैं। बालेन्दु ने विज्ञापनों के क्षेत्र में आ रहे बदलावों का भी जिक्र किया और कहा कि ऑनलाइन विज्ञापन प्लेटफॉर्म न सिर्फ विज्ञापनदाता बल्कि दर्शक/पाठक के भी हितों के अनुकूल हैं और टेलीविजन जैसे पारंपरिक माध्यम लंबे समय तक पुराने तौर तरीकों पर आश्रित नहीं रह सकते। इस परिस्थिति का सामना करने के लिए इनोवेशन की तरफ बढ़ने की जरूरत है और नए मीडिया के साथ आने की जरूरत है।

बीबीसी हिंदी के संपादक निधीश त्यागी ने कहा कि आज के पत्रकारों को भाषा पर ध्यान देने की बेहद ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि सही वाक्य न लिख पाने वाले पत्रकारों की पूरी की पूरी पीढ़ी मीडिया के अस्तित्व के लिए बहुत बड़ी भावी चुनौती सिद्ध होने वाली है।

कार्यक्रम के दौरान भारतीय जनसंचार संस्थान के दो छात्रों नंद राम प्रजापति और आशीष कुमार शुक्ला को आलोक तोमर फेलोशिप प्रदान की गई। लखनऊ स्थित शकुंतला देवी पुनर्वास विश्वविद्यालय के उप कुलपति निशीथ राय ने हिंदी विभाग के टॉपर छात्र को आलोक तोमर स्मृति स्वर्ण पदक देने की घोषणा की।

हिन्दी-उर्दू में भी होंगी ट्विटर नीतियां

दिल्ली। सोशल नेटसाइट ट्विटर अपनी उपयोक्ता नीतियों को हिन्दी व उर्दू सहित अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद करेगी। इससे वह देश के गैर-अंग्रेजी भाषी क्षेत्र में अपने नेटवर्क के बेहतर इस्तेमाल को बढ़ावा दे सकेगी।

ट्विटर जनरल काउंसल विजया गाडे ने बताया, भारत हमारे लिए महत्वपूर्ण देश है, ट्विटर का इस्तेमाल करने वालों कोशिक्षित करना हमारा मुख्य क्षेत्र है। यहां गैर-अंग्रेजी भाषी लोगों की बड़ी संख्या है। 

उन्‍होंने कहा, हम अपनी नीतियों को हिन्दी और उर्दू जैसी भाषाओं में अनुवाद करने पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा किइससे उपयोक्ताओं को नीतियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।

वर्तमान में ट्विटर अपनी उपयोग शर्तों की जानकारी जर्मन, फ्रैंच, पुर्तगाली, स्पेनिश और कोरियाई भाषा में उपलब्ध कराता है। (भाषा)