हिंदी ई-पत्रकारिता
डॉ स्मिता मिश्र
पिछले एक दशक में सूचना क्रांति ने कितना कुछ
बदल दिया। पहले तकनीक फिर हमारी सोच। भारत में दो दशक पहले यह सोच पाना मुश्किल था
कि पत्रकारिता का कोई ऐसा माध्यम भी हो सकता है जो अखबार, रेडिया, टीवी पर
हावी होकर सर्वाधिक शक्तिशाली हो जाएगा। किन्तु दो दशकों में ही वर्चुअल यथार्थ न
केवल वास्तविक यथार्थ के बरक्स आ खड़ा हुआ
है बल्कि उसे
डिक्टेट भी कर रहा है। आज व्यक्ति हो या संस्थान अपनी वास्तविक उपस्थिति से ज्यादा
वर्चुअल उपस्थिति दिखाए जाने के लिए तत्पर है।
भारत में हिंदी पत्रकारिता की प्रिंट से ऑनलाइन
होने की एक लम्बी यात्रा है, लगभग
दो सदियों की I 1780 में भारत
का पहला समाचार पत्र हिक्की-गज़ट
प्रकाशित हुआ और 1826 में हिंदी का पहला समाचार पत्र ‘उदन्त
मार्तंड’ I दोनों समाचार-पत्र कलकत्ता से प्रकाशित
हुए I प्रत्येक समय में पत्रकारिता समय और
उपलब्ध तकनीक के आधार पर परिवर्तित होती गयी। मुद्रित माध्यम से रेडियो और
टेलीविज़न माध्यम की पत्रकारिता आई I अब ये
माध्यम भी पुराने हो गए क्योकिं न्यू मीडिया तकनीक से ई-पत्रकारिता
अस्तित्व आईI 15 अगस्त 1995 को
विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL) ने भारत में इन्टरनेट सेवा प्रारंभ की I 1995 में ही भारत का प्रथम ई –समाचार
पत्र दी हिन्दू शुरू हुआ I
विश्व में इन्टरनेट की यात्रा साठ के दशक में अमेरिका
से प्रारंभ होती है, जहाँ इन्टरनेट
सर्वप्रथम रक्षा मामलों के लिए प्रयुक्त
हुआ I 1989 में टिम बर्नर ली ने पहले वर्ल्ड
वाइड वेब यानि WWW और फिर हाइपर टेक्स्ट मार्कअप
लैंग्वेज (HTML)का अविष्कार किया I इससे इन्टरनेट
के द्वारा नई संभावनाओं का क्षितिज खुल गया I इंटरनेट
आधारित सामग्री के लिए कम्प्युटर की यह भाषा एक बड़ा वरदान सिद्ध हुई,जिसके
चलते दुनिया का प्रथम ई-समाचार पत्र 1992 में
शिकागो ट्रिब्यून नाम से निकलाI जैसा
कि पूर्व उद्धृत किया जा चुका है कि भारत का प्रथम ई-समाचार पत्र ‘दी हिन्दू’ था
जोकि 1995 में निकलाI 1995 में ही अमेरिका
के सर्वर की मदद से indiaworld.com वेब पोर्टल प्रारंभ हुआ। इसके पश्चात् सभी
प्रमुख समाचार पत्रों ने अपने ई – संस्करण
शुरू किये -1996 में ‘टाइम्स
ऑफ इंडिया और ‘द हिन्दुस्तान टाइम्स’, 1997 में
जागरण डॉट कॉम, 1998 में ‘अमरउजाला
डॉट कॉम’,‘भास्कर डॉट कॉम’, 1999 में ‘वेबदुनिया
डॉट कॉम’ आदि।
सूचना की इस ‘त्वरित संचार क्रांति’ में
हिन्दी अनुपस्थित नहीं रही। शुरुआत में इन्टरनेट हिंदी को रोमन लिपि में लिखा जाता था और रोमन में ही हिंदी सामग्री
डाली जा रही थी Iदेवनागरी
लिप में हिंदी सामग्री डालने में तकनीकी दिक्कतें थी , जिसे
कुछ हद तक सुषा और कृतिदेव फॉण्ट ने दूर कियाI हिंदी
के पहले वेब पोर्टल ‘वेब
दुनिया’ ने अपने फॉण्ट बनाये ,फिर अलग-अलग
समाचार साईट अपने-अपने फॉण्ट बनाने लगी I हिन्दी
फांट और की-बोर्ड की समस्या के कारण पहले बहुत
कम लोग इससे जुड़े। पर गूगल ट्रांसलिटरेशन के आ जाने से यूनिकोड फांट ने हिन्दी
एवं दूसरे भाषाई ब्लॉगरों के लिए न्यू-मीडिया का रास्ता खोल दिया। पहले इन्टरनेट
की हिंदी सामग्री का उपयोग करने के लिए बहुत जुगाड़ करने पड़ते थे Iइसलिए
इन्टरनेट पर हिंदी का प्रयोग जोर नहीं पकड़ पा रहा था I इन
दिक्कतों को देखते हुए यूनिकोड को समाधान के रूप में लाया गया I यूनिकोड
के आगमन से हिन्दी की जिस नई धारा का जन्म हुआ उसने सभी भाषाई प्रतिबद्धताओं को
तोड़ डाला है। अभी तक लोग कम्प्यूटर और अंग्रेजी का ही संबंध जोड़ते थे किन्तु
यूनिकोड (यूनिवर्सल कोडिंग) फांट के
द्वारा हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाएं भी कम्प्यूटर पर अपनी सहज उपस्थिति दर्ज
कराने लगीं। हिन्दी ई-पत्रकारिता, हिन्दी
ब्लॉगिंग एवं वेबसाइट को बहुत बल मिला। आम व्यक्ति के लिए अपनी भाषा में टाइप कर
इंटरनेट पर डालना ‘बायें हाथ का खेल’ हो गया। यूजर
फ्रेंडली तकनीक का साथ मिल जाने से हर आमों ख़ास हिंदी में ब्लोगिंग या सोशल मीडिया
पर पोस्टिंग हिंदी में करने लगा I
न्यू मीडिया नए संचार अवसरों का प्लेटफ़ॉर्म
बनकर आया जिसके कारण पूरा परिदृश्य बदल गया है । पत्रकारिता का तो जैसे मिजाज ही
बदल गया। पत्रकारिता के पारंपरिक स्वरूप में भारी बदलाव आ गया। आज जिस व्यक्ति के
पास प्रौद्योगिकी है और साथ ही उसे उस तकनीक की ताकत का अंदाजा है, वह
व्यक्ति इतना शक्तिशाली है कि स्वयं ही मीडिया का कोई उद्यम शुरू कर अनगिनत लोगों
पर अपनी पहुंच बना सकता है।
वेब पर आधारित इस नई प्रौद्योगिकी के कारण ‘ई-पत्रकारिता’ या वेब-पत्रकारिता
शब्द अस्तित्व में आए। ई-पत्रकारिता
शब्द सूचना क्रांति द्वारा उपजी एक नए माध्यम यानी न्यू मीडिया द्वारा की जाने
वाली पत्रकारिता के लिए गढ़ा गया। किन्तु ‘न्यू मीडिया’ एक
माध्यम भर नहीं बदला बल्कि इस माध्यम ने मीडिया का एक नया रूप गढ़ दिया । इस नये
माध्यम में नवीनता तो थी ही, साथ ही
अब तक के तमाम मीडिया माध्यमों की विशेषताओं को भी अपने में समाहित कर लिया।
प्रिंट मिडिया का टेक्स्ट, रेडिया
की श्रव्यता और टेलीविजन की दृश्य-श्रव्यता
सभी चारित्रिक गुणों को अपने में समावेश कर लिया। इसी के कारण इसे ‘मल्टी मीडिया पत्रकारिता भी कहा
जाने लगा ।नई सूचना तकनीक पर आधारित इस पत्रकारिता के ज़रिये सूचनाओं को त्वरित गति से विश्व व्यापी बनाया जा सकता है I ऐसा
संभव हुआ लाइट वेट कैमरा,मोबाइल
फ़ोन डिजिटल कैमरा ,लैपटॉप और ऑडियो-फीड सेI आज
पत्रकार मोबाइल से वीडियो,ऑडियो,फोटो या
टेक्स्ट के रूप में या सभी रूपों में समाचार तुरंत वेबसाइट या सोशल मीडिया पर
अपलोड कर देता है I न्यू मीडिया इतना त्वरित माध्यम है
कि देश काल की सीमाओं से परे किसी भी सूचना को तत्काल उपलब्ध करा देता है। टेक्स्ट, ऑडियो
और वीडियो सभी सूचनाओं को एक वेब पृष्ठ पर उपलब्ध करा देता है।
यह माध्यम पारंपरिक जनमाध्यमों की तरह इकतरफा
संचार नहीं करता बल्कि यह इंटर-एक्टिव
मीडिया है। पहले प्रापक (पाठक, श्रोता, दर्शक) की
भागीदारी पाठकों के पत्र या ‘फोन-इन’ तक ही
सीमित होती थी। आज वह स्वयं समाचार निर्मिति में भूमिका निभाने लगा है। अभिव्यक्ति
के नये साधन सामने आने से गूगल, फेसबुक, यू-ट्यूब
के द्वारा आज हर व्यक्ति पत्रकार की भूमिका में आ खड़ा हुआ है। सोशल मीडिया के
द्वारा अपनी और दूसरों की निजी जीवन सार्वजनिक किया जा रहा है। मुख्यधारा का
मीडिया सोशल मीडिया को समाचार-स्त्रोत
के रूप में प्रयोग करने लगा है। न्यू मीडिया की विविधता ने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक
दोनों माध्यमों के समक्ष बड़ी चुनौती रख दी है और वह चुनौती है सबसे तेज होने की। जिन टी.वी
चैनलों ने अपनी पंचलाइन ही रखी थी- सबसे
तेज चैनल, वे पंचलाइन अब
बेमानी हो गयी हैं।
आज प्रत्येक समाचार पत्र और टीवी चैनल की
समाचार वेबसाइट हैI रेडियो स्टेशन मल्टी- मीडिया एप्रोच
कर रहे हैं I स्टूडियो में कैमरा लगवाए जा रहे
हैं ताकिन उसे भी न्यूज़ पैकेज की तरह वितरित किया जा सके I प्रत्येक
RJ के
ट्विटर हैंडल हैं ,सोशल मीडिया अकाउंट है जिसके द्वारा
श्रोता भर ही नहीं बल्कि दर्शकों और यूजर से भी संपर्क क्या जा सके I फिर भी
यह तो तय है कि रेडियो अभी भी प्रधानतः स्पोकन वर्ड का माध्यम ही है I रेडियो
पर प्रसारित होने वाले प्रधानमंत्री के चर्चित मासिक कार्यक्रम ‘मन की
बात’ इसका जीवंत उदाहरण हैI यह
कार्यक्रम रेडियो के साथ साथ वेबसाइट ,टेलीविज़न
पर एक साथ लाइव रहता हैI
ई-पत्रकारिता में से ही सिटिजन जर्नलिस्ट की अवधारणा भी अस्तित्व में आई।
ब्लॉग, वेबसाइट, सोशल
मीडिया आदि ने प्रत्येक व्यक्ति को पत्रकार के रूप में खड़ा कर दिया है। वेब की
दुनिया में आज पाठक और संपादक में फर्क कम रह गया है।न्यू मीडिया ने ब्लॉगरों और
सिटिजन जर्नलिस्ट को ऐसी पीढ़ी तैयार कर दी है जोकि निजी अभिव्यक्ति ही नहीं कर
रहे बल्कि व्यवस्था में हस्तक्षेप का भी कार्य कर रहे हैं। सिटिजन जर्नलिस्ट वह
पत्रकार है जो स्वेच्छा से कोई समाचार बनाता है और वितरित करता है ,जिसका
उसे कोई मानदेय नहीं मिलता है I 24x 7 टीवी
चैनल नागरिक पत्रकारों के द्वारा शेयर
किये गए समाचारों और वीडियो से ही पूरा
समाचार बनाकर प्रस्तुत कर रहे हैंI
अब ब्रेकिंग न्यूज़ सबसे पहले सोशल मीडिया पर
ब्रेक होती हैं ,फिर
चाहे वह राजनीतिक हेरफेर का का मामला हो या
पेड न्यूज का I नीरा
राडिया, विकीलीक्स इसके बेहतर उदहारण हैं।फ़िल्मी स्कूप या सूचनाओं के
लिए आज पत्रकार भिन्न-भिन्न फिल्म स्टार के सोशल मीडिया के फोलोवेर्स बन जाते है ,जहाँ से सूचनाये उन्हें मिल जाती है Iफिल्म
स्टार न्यूज़ में बने रहने के लिए स्वयं ही अपनी निजी सूचनाएँ साझा कर देते है,जबकि
पहले पत्रकारों को उनके पीछे-पीछे भागना होता था या निजी जीवन में तांक- झाँक करने
के लिए बड़े जुगाड़ करने पड़ते थे Iफिल्म
ट्रेड-विश्लेषक तरन आदर्श तुरंत ही किसी भी नई फिल्म के रिलीज़ होने पर फिल्म
विश्लेषण ,उसकी कमाई का आकलन कर ट्वीट कर देते हैंI अमिताभ
बच्चन ,आमिर खान , ऋषि कपूर
,करन
जौहर, कपिल शर्मा अपने ट्वीट से ही फ़िल्मी पत्रकारों को खूब खबर का मसाला दे देते
हैं I
अब पत्रकारों को विपक्षी नेताओं के बयान के लिए
उनके घरों में भागम-भाग नहीं करनी पड़ती ,बल्कि
सोशल मीडिया पर ही बयानबजी मिल जाते हैं I अपराध-पत्रकारिता
में भी आरोपी और विक्टिम के सोशल मीडिया स्टेटस से बहुत सूचनाएँ मिल जाती हैं विकिलीक्स
आज सबसे बड़ी खोजी पत्रकारिता का उदाहरण है I पहले
समाचार पत्र में जो भी लेख छपता था उसकी अनिवार्य शर्त होती थी कि वह अप्रकाशित
होना चाहिए ,किन्तु अब सोशल मीडिया पोस्ट
को सम्पादकीय पृष्ठ पर जगह मिलती है , उनके
अलग से कॉलम भी होते हैं I
इसी तरह खेल पत्रकारिता में खिलाडी ट्विटर और
फेसबुक के ज़रिये अपनी फोटो और स्टेटमेंट
को पोस्ट करते रहते हैंIसानिया
मिर्ज़ा ,लीएंडर पेस ,विराट कोहली, शिखर
धवन,योगेश्वर दत्त ,सुशील
कुमार, बॉक्सर विजेंदर सिंह के सोशल मीडिया
पर पोस्ट की गयी फोटो और स्टेटस काफी समाचार दे देते हैं I प्रमुख
समाचार पत्रों के खेल पृष्ठों पर तो खेल कवरेज होती रही है ,खेल पर
आधारित स्पोर्ट्स स्टार ,क्रिकेट
स्टार ,स्पोर्ट्स क्रीडा जैसे खेल पत्र पत्रिकाओं के लिए भी न्यू मीडिया
प्रमुख समाचार स्त्रोत हैं I इधर
स्पोर्ट्स वेबसाइट cricinfo.com,sportskeeda.com,sportsgranny.com जैसी वेबसाइट भी खेल पत्रकारिता में
महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं I
हिंदी ब्लॉग एक सशक्त माध्यम के रूप में हिंदी
ई-पत्रकारिता के माध्यम बन कर आये Iअभिव्यक्ति
के विभिन्न माध्यमों पर उपलब्ध और निरंतर रची जा रही विधाओं के दस्तावेजीकरण का
ऐसा प्रयास है जो व्यक्तिगत होते हुए भी सामाजिक है और सामाजिक होते हुए भी एकल है
I राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान दिल्ली
विश्वविद्यालय के खालसा कॉलेज के वेब पत्रकारिता के विद्यार्थियों ने खेल ब्लॉग
बनाया और स्वयं रिपोर्टिंग करके मल्टी मीडिया समाचार अपलोड़ करते रहे। यह ब्लॉग
खेलों के दौरान इतना लोकप्रिय रहा कि तमाम अन्य देशों के पत्रकार इसे ‘ऑफिशियल
ब्लॉग’ मानने लगे। इसी प्रकार शायरी ,यात्रा-पर्यटन,कुकिंग ,इलेक्ट्रॉनिक-गज़ट,क़ानून
शिक्षा ,स्वास्थ्य आदि तमाम विषयों पर हिंदी
के ब्लॉग ई-पत्रकारिता की संकल्पना को सशक्त कर
रहे हैं I
यह तय
है कि ई-पत्रकारिता से पत्रकारिता का लोकतांत्रिकरण हुआ है
Iआज \आम आदमी
से जुड़ने के लिए सभी तत्पर हैं ,फिर
चाहे वे बड़े-बड़े कॉरपोरेट घराने हों या फिल्म स्टार या फिर बड़े
बड़े नेता I जनसंपर्क का सर्वाधिक सशक्त माध्यम
बनकर उभरा है यह न्यू मीडिया। भारत
सरकार को प्रेस ब्रीफिंग की मजबूरी नहीं
रह गयी है ,वह ई-गवर्नेंस के ज़रिये महवपूर्ण
आधिकारिक सूचनाएँ वेबसाईट या सोशल मीडिया पर डाल देती हैI अभी तक हमारा मीडिया कला एवं साहित्य से परहेज करता रहा
है। बड़े से बड़े साहित्यकार की उपलब्धि, साहित्यिक समाचार गौण
हो जाता है और छोटे से छोटे नेता का बयान अखबार के पहले पृष्ठ पर आ जाता है।
किन्तु आज कोई भी साहित्यिक समाचार अखबार या टी.वी का
मोहताज नहीं, ब्लॉगर तुरंत अपने ब्लॉग पर डाल कर से सोशल मीडिया में
साझा कर देता है। साहित्य की तमाम ई-पत्रिकाएं निकल
रही हैं जैसे अनुभूति.कॉम ,कविता कोष हिन्द युग्म आदि । चिट्ठा-जगत के
वासी, फुरसतिया ,रवि
रतलामी ,मेरा पन्ना,रोजनामचा
,जानकी
पुल आदि हिंदी के चर्चित ब्लॉग हैं I यहीं नहीं हिन्दी के साहित्यकार स्वयं फेसबुक पर
उपस्थित हो रहे हैं और अपनी नई रचनाओं ,पुरस्कारों से अपने पाठकों को परिचित करा
रहे हैं । इसी प्रकार साहित्य और भाषा विमर्श के वैश्विक समूह गूगल, याहू पर
उपस्थित है जैसे हिंदी विमर्श ,हिंदी शिक्षक बंधू ,हिंदी
अनुवादक ,ई-कविता आदि ।
चुनौतियाँ –
सूचना एकत्रीकरण ,सूचना
निर्मिति एवं सूचना वितरण में भारी अंतर होने के बावजूद प्रोफेशनल ई-पत्रकारिता
भी पारंपरिक पत्रकारिता की भांति न्यूज़ सेन्स और
एथिक्स पर जोर देती है और इसके उल्लंघन को बेहतर पत्रकारिता नहीं माना जाता
है I गूगल,
विकीपीडिया, यू-ट्यूब
और फेसबुक के कारण जहां आज की पत्रकारिता आसान हुई है वहीं नक्कालों की तादाद भी
बढ़ी है। कंट्रोल ‘सी’ और
कंट्रोल ‘वी’ की कट
एंड पेस्ट की पत्रकारिता जोर मार रही है। गूगल से सामग्री खंगाल कर उसे मौलिक लेखन
के रूप में रूपांतरित करने में बड़े-बड़े
पत्रकार, साहित्य की नई अवधारणाएं बताते
साहित्यकार, आलोचक भी शामिल है।
दूसरा एक बड़ा भारी संकट लोकतंत्र के साथ न्यू
मीडिया में आया- अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता का दुरुपयोग। समस्या यह है कि ब्लॉग हो या सोशल मीडिया में अभिव्यक्ति
करने वाले विद्वान अपने निजी विचारों को रिपोर्ट अथवा सृजनात्मक भाषा में तब्दील नहीं करते। परिणाम स्वरूप अभद्र
भाषा, अश्लीलता या इकतरफा मत बढ़ता जा रहा
है। कोई भी कुछ भी सामाजिक जिम्मेदारी को अनुभव किए बिना लिख देता है। पारस्परिक
द्वेष को गाली-गलौज के स्तर पर आकर सोशल मीडिया
में साझा कर रहे हैं। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। इसलिए आत्मअंकुश बहुत आवश्यक
है। ब्लैकमेलिंग एवं अभद्र भाषा के प्रयोग को संयमित किया जाना जरूरी है।
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000-:
इसी निरंकुशता के चलते नई स्थितियों के नियमन
के लिए 2000 में भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी
कानून को प्रभाव में लाया गयाI फिर
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरूपयोग और
नक्कालो से बचाने के लिए इसमें 2008 में
धारा 66-A जोड़ी गयी I इसके
अंतर्गत कम्प्युटर,मोबाइल आदि के जरिये भेजे गए या
फॉरवर्ड किये गए अपमानजनक संदेशों के आधार पर गिरफ़्तारी संभव थी Iपर इस
धारा को श्रेया सिंघल द्वारा दायर की गयी याचिका पर मार्च 2015 में
सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 66-A को असंवैधानिक
घोषित कर दिया I बौद्धिक संपदा की सुरक्षा हेतु भी
कॉपीराइट ,पेटेंट ,ट्रेडमार्क
आदि बौद्धिक संपदा अधिकार कानूनों में भी
न्यू मीडिया के कारण संशोधन किया गया।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हिंदी ई-पत्रकारिता
की शुरुआत रोमन लिपि में या फिर पीडीएफ़ में
हिंदी सामग्री अपलोड करने से हुई थी I यूनिकोड आगमन के बाद हिंदी में कंटेंट
अपलोड होने लगा I सर्च इंजन ,हाइपर-लिंक
आदि भिन्न-भिन्न प्रयोग होने लगे और अब न्यू
मीडिया के अनुरूप ही कंटेंट और भाषा विकसित हो रही है I विश्व भर का सर्वाधिक युवा आबादी वाले देश भारत में पिछले
महीने तक के भारतीय इन्टरनेट और मोबाइल
एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार 450 मिलियन
मोबाइल यूजर हो गए हैI यह
आंकड़ा थ्री-टीयर शहरो और गाँवों में बराबर बढ़
रहा हैI जियो टेलिकॉम के कारण आई भारी
प्रतिस्पर्धा के कारण इन्टरनेट डाटा पैकेज बहुत सस्ते हो रहे हैं I ऐसी
स्थिति निश्चित रूप से न्यू-मीडिया और ई-पत्रकारिता
के लिए माकूल है क्योंकि युवा फ़टाफ़ट सूचना और समाचार पाना चाहता है चाहे फिर
वेबसाइट से हो ,व्हाट्स-एप पर
हो या फिर फेसबुक पर I ऐसी
स्थिति में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आने वाला समय भाषाई पत्रकारिता का ही
है I
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