Thursday, February 24, 2011
Friday, December 31, 2010
Wednesday, October 20, 2010
बाहर टिकट फुल :अंदर खाली स्टेडियम
राष्ट्रमंडल खेलों का सफल हो जाना भारत के लिये एक उपलब्धि है|मैं कमेंट्री बाक्स से खाली खाली स्टेडियम देखतरहती|आलोचक यह कहते नहीं थकते थे कि दिल्ली एक स्पोर्टिंग सिटी नहीं है|लेकिन सच यह नहीं था|
दिल्लीवासी तमाम असुविधाओं के होते हुए भी खेल के उत्साह में रँगने के लिये बेताब थे|लेकिन विचित्र स्थिति तब होती है जब वे टिकट खरीदने जाते हैं तो ऑल सोल्ड का नोटिस लगा होता है,लेकिन स्टेडियम में दर्शक दीर्घा पूरी खाली होती थी|
प्रश्न यह है कि टिकटें गयी कहाँ?तब मन यह करता कि कमेंटेटर बाक्स से निकल कर दर्शकों की कमी पूरी करने की कोशिश करूँ|खालसा कॉलेज की हूँ न!अपने को सवा लाख से तो कम समझती ही नहीं हूँ|लेकिन में तो स्विमिंग कांप्लेक्स में थी.पूरा का पूरा वी.आई.पी. ब्लाक खाली था|जो भी दर्शक नजर आ रहे थे वे या तो पुलिस कर्मी थे या खिलाड़ी या उनके परिवार जन|हाँ मीडिया बहुत तादाद में था|अगर उन खाली कुर्सियों पर हमारे स्कूल या काँलेज के बच्चे बिठा दिये जाते तो उन्हीं बच्चों में से कोई गगन नारंग,प्रशांत करमाकर,सायना नेहवाल बनने की प्रेरणा ले जाता|और सुरक्षा की दृष्टि से भी ये सेफ थे|
जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम 60000 की क्षमता वाला स्टेडियम है|अब यदि वहाँ 500 भी न नजर आए तो यह प्रश्न सहज ही उठेगा कि कौन है जो टिकटों की कालाबाजारी कर रहा है|बेचारे एथलीट उन गिने चुने दर्शकों से गुहार लगाते नजर आए कि यार.. जरा ताली बजाओ,तभी तो हमें जोश आएगा और हमारा परफारमेंस बेहतर होगा|वही गिने चुने दर्शक बेचारे ताली पीट-पीट कर अपने हाथ लाल करते रहे|उस पर भी जुलम यह हो गया कि आयोजक आ जाते कि जनाब आपकी टिकट का टाइम खत्म हो गया, बाहर निकलो और बेचारे एथलीट उन गिने चुने दर्शकों को बड़ी पीड़ा से बाहर जाते देखते|
होम ग्राउंड का फायदा न तो खिलाड़ियों को मिला न ही दर्शकों को बहुत जरूरी है कि इसकी कायदे से तफ्तीश की जाए ताकि खेल के अपराधियों को पकड़ा जा सके|
दिल्लीवासी तमाम असुविधाओं के होते हुए भी खेल के उत्साह में रँगने के लिये बेताब थे|लेकिन विचित्र स्थिति तब होती है जब वे टिकट खरीदने जाते हैं तो ऑल सोल्ड का नोटिस लगा होता है,लेकिन स्टेडियम में दर्शक दीर्घा पूरी खाली होती थी|
प्रश्न यह है कि टिकटें गयी कहाँ?तब मन यह करता कि कमेंटेटर बाक्स से निकल कर दर्शकों की कमी पूरी करने की कोशिश करूँ|खालसा कॉलेज की हूँ न!अपने को सवा लाख से तो कम समझती ही नहीं हूँ|लेकिन में तो स्विमिंग कांप्लेक्स में थी.पूरा का पूरा वी.आई.पी. ब्लाक खाली था|जो भी दर्शक नजर आ रहे थे वे या तो पुलिस कर्मी थे या खिलाड़ी या उनके परिवार जन|हाँ मीडिया बहुत तादाद में था|अगर उन खाली कुर्सियों पर हमारे स्कूल या काँलेज के बच्चे बिठा दिये जाते तो उन्हीं बच्चों में से कोई गगन नारंग,प्रशांत करमाकर,सायना नेहवाल बनने की प्रेरणा ले जाता|और सुरक्षा की दृष्टि से भी ये सेफ थे|
जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम 60000 की क्षमता वाला स्टेडियम है|अब यदि वहाँ 500 भी न नजर आए तो यह प्रश्न सहज ही उठेगा कि कौन है जो टिकटों की कालाबाजारी कर रहा है|बेचारे एथलीट उन गिने चुने दर्शकों से गुहार लगाते नजर आए कि यार.. जरा ताली बजाओ,तभी तो हमें जोश आएगा और हमारा परफारमेंस बेहतर होगा|वही गिने चुने दर्शक बेचारे ताली पीट-पीट कर अपने हाथ लाल करते रहे|उस पर भी जुलम यह हो गया कि आयोजक आ जाते कि जनाब आपकी टिकट का टाइम खत्म हो गया, बाहर निकलो और बेचारे एथलीट उन गिने चुने दर्शकों को बड़ी पीड़ा से बाहर जाते देखते|
होम ग्राउंड का फायदा न तो खिलाड़ियों को मिला न ही दर्शकों को बहुत जरूरी है कि इसकी कायदे से तफ्तीश की जाए ताकि खेल के अपराधियों को पकड़ा जा सके|
Saturday, August 21, 2010
टप टप बरसा पानी और ,करते रहे हम कमेंट्री ,,वाह वाह....
आज इंदिरा गाँधी स्टेडियम में जिम्नास्टिक का टेस्ट इवेंट शुरू हुआ.हम बहुत तैयारी के साथ बैठे टीवी कमेंट्री करने ..सुरक्षा जांच वालो ने हमें पानी की बोतल नहीं लाने दी.हमारा सेब भी वापिस करवा दिया ,हमने कहा कोई नहीं ,मीडिया सेंटर में तो सब मिल ही जाएगा ,एक घंटा हुआ २ घंटे हुए. हम पानी वानी,चाय का इंतज़ार करते रहे ,पर वह न आया और न उसकी कोई खबर आई .कई घंटे लगातार बोलना फिर पानी नहीं मिलना,हमें तुरंत ईश्वर याद आ गए .उन्होंने भी बिना देर किये हमारी सुन ली ,और पानी बरसने लगा ,खूब बरसा ,अचानक मेरे मुह पर पानी की बूँद गिरी ,,उपर देखा तो छत से पानी की टप टप बूँद गिरने लगी.भगवान के घर देर है अंधेर नहीं.भगवान ने सीधा अपने घर से हमारे लिए supply भेज दी,सच में जय हो प्रभु .
Sunday, July 25, 2010
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