Saturday, September 16, 2017

हिंदी में ई-सामग्री : वर्तमान स्थिति/डॉ. धनजी प्रसाद (साभार लेख )

Monday, July 10, 2017

हिंदी में ई-सामग्री : वर्तमान स्थिति


आभ्यंतर : लोक, भाषा, विश्व साहित्य और समकालीन वैचारिकि का मंच; वर्ष-01, अंक : 02, जनवरी-2017
ISSN: 2348-7771, संपादक : कुमार विश्वमंगल पाण्डेय, जहाँगीरपुरी दिल्ली


डॉ. धनजी प्रसाद , सहायक प्रोफेसर, (भाषा-प्रौद्योगिकी)
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)
dhpr.langtech@gmail.com1. परिचय
आज के समय में इंटरनेट हमारे तकनीकी जीवन का आधार है। पाठ, चित्र के अलावा ऑडियो-विजुअल सामग्री में असीमित मात्रा में आज इंटरनेट पर उपलब्ध है। किसी भी प्रकार की जानकारी या ज्ञान की आवश्यकता होने पर हम तुरंत इंटरनेट खोलते हैं और उसे प्राप्त कर लेते हैं। इंटरनेट हमारे जीवन में ज्ञान-विज्ञान, प्रचार-प्रसार और सूचनाओं के त्वरित विस्तारण का माध्यम बन चुका है। इसलिए आज किसी भी देश या समाज की तकनीकी प्रगति बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वह इंटरनेट से कितना जुड़ा हुआ है या इंटरनेट का वहाँ कितना विस्तार है। यह बात भाषा के संदर्भ में भी उतनी ही सत्य है। आज किसी भी भाषा के प्रयोग और विस्तार को बढ़ाने के लिए उस भाषा में इंटरनेट पर सामग्री उपलब्ध होना अतिआवश्यक है।
हिंदी भारत की राजभाषा है। पिछले कुछ दशकों में हिंदी को तकनीकी के क्षेत्र में अग्रणी भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए अनेक प्रकार के संस्थागत और व्यक्तिगत प्रयास किए गए हैं। भारत में कंप्यूटर क्रांति के बाद इंटरनेट क्रांति आज के समय की माँग है। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री माननीय मोदी जी द्वारा भी ‘डिजिटल इंडिया’ के रूप में तकनीकी साधनों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिनमें इंटरनेट सर्वोपरि है। इंटरनेट का वास्तविक अर्थों में भारत में विस्तार तभी हो सकेगा, जब इंटरनेट पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक सामग्री उपलब्ध हो सकेगी। इसलिए आज यह जानना नितांत आवश्यक है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में कितनी और किस प्रकार की सामग्री इंटरनेट पर उपलब्ध है। इसी का ध्यान रखते हुए व्यक्तिगत स्तर पर हिंदी में ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री का एक सर्वेक्षण करके प्रमुख वेबसाइटों और उन पर उपलब्ध सामग्री के बारे में प्रस्तुत आलेख में चर्चा की जा रही है। इसे निम्नलिखित शीर्षकों में प्रस्तुत किया जा रहा है-
भाषा और साहित्य, हिंदी विकिपेडिया, स्वास्थ्य और चिकित्सा, मीडिया (समाचार चैनल और समाचार पत्र), मनोरंजन (सिनेमा और गीत)
2. भाषा और साहित्य
इंटरनेट ज्ञान को संग्रहित करने एवं प्राप्त करने का आज सबसे बड़ा भंडार है। यहाँ पर भी हिंदी ने प्रभावशाली दस्तकत दी है। आज हिंदी के लाखों  ब्लॉग एवं वेबसाइटें हैं। ब्लॉग एवं वेबसाइटों के अतिरिक्त धीरे-धीरे हिंदी के बहुत सारे भाषिक टूल भी इंटरनेट पर ऑनलाइन उपलब्ध हो गए है; जैसे: हिंदी के ई-कोश, हिंदी शब्द-तंत्र (Hindi WordNet) एवं हिंदी साहित्य तथा ज्ञान विज्ञान से संबंधित ई-लाइब्रेरी आदि। इन सभी की उपलब्धता आधुनिक युग में हिंदी को नई ऊँचाई प्रदान कर रही है। इंटरनेट पर केवल हिंदी ही नहीं बल्कि अनेक भारतीय भाषाओं के लिए ऑनलाइन शब्दकोश उपलब्ध कराने वाली वेबसाइटें हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न प्रकार की सामग्री और साहित्य उपलब्ध कराने वाली वेबसाइटें भी हैं। उदाहरण के लिए कुछ वेबसाइटों को देख सकते हैं-
2.1 http://www.hindisamay.com/ : यह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा का एक बृहद प्रयास है। जिसमें हिंदी के प्रमुख साहित्यकारों की रचनाओं की सामग्री लगभग पाँच लाख पृष्ठों में उपलब्ध है और आगे भी कार्य निरंतर जारी है। हिंदी के विविध रचनाकारों को इसमें वर्णानुक्रम में उनके नाम के अनुसार खोजा जा सकता है, अथवा हिंदी साहित्य के विविध क्षेत्रों के लिए दिए गए टैबों को क्लिक करके भी आवश्यक सामग्री प्राप्त की जा सकती है-

आज देश-विदेश में लाखों लोगों द्वारा हिंदी सीखने और सीखाने के लिए इसका प्रयोग किया जा रहा है।
2.2 http://www.shabdkosh.com/ : इस वेबसाइट पर अंग्रेजी-हिंदी या हिंदी-अंग्रेजी में शब्दार्थ देखे जा सकते हैं। साथ इसमें हिंदी के अलावा बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी,पंजाबी, तमिल और तेलुगु भाषाओं के विकल्प भी उपलब्द हैं। इसमें एक-एक शब्द के 40 तक अर्थ देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए ‘science’ शब्द का अर्थ देखने पर 14 अर्थ प्राप्त होते हैं- अध्ययन,उस्तादी, कौशल, ज्ञान, तकनीक, प्रक्रिया, विज्ञान, विद्या, विषय,  शास्त्र, हुनर, इल्म, विद्या, विभाग। इसी प्रकार प्रत्येक शब्द के उच्चारण को सुना भी जा सकता है। इसी प्रकार पर्यायवाची और विलोम आदि की भी व्यवस्था है।
2.3 http://bharatdiscovery.org/india/मुखपृष्ठ : भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक थाती को सहेजता हुआ यह एक उल्लेखनीय प्रयास है। इसमें भारत के इतिहास, पर्यटन, साहित्य,धर्म, संस्कृति, दर्शन आदि से जुड़ी विशाल सामग्री एक ही स्थान पर प्राप्त हो जाती है- 



2.4 http://kavitakosh.org/kk/कविता_कोश_मुखपृष्ठ : हिंदी और उसकी बोलियों के लोक साहित्य को सहेजने की दृष्टि से यह भी एक बड़ा संकलन है। इसमें हिंदी की अनेक सहभाषाओं और बोलियों के लोक साहित्य को देखा और पढ़ा जा सकता है-


2.5 http://www.hindikunj.com/ : यह भी हिंदी साहित्य और व्याकरण संबंधी ज्ञान के लिए एक उत्तम स्रोत है। वैसे इस वेबसाइट पर व्याकरण संबंधी ज्ञान बहुत कम है, किंतु साहित्यिक सामग्री पर्याप्त मात्रा में है-

इसी प्रकार इंटरनेट पर करोड़ों वेबसाइटें हैं जहाँ प्रत्येक विषय से संबंधित ज्ञान विशाल मात्रा में उपलब्ध है। यद्यपि यहाँ भी अंग्रेजी का वर्चस्व है किंतु इसके बावजूद विभिन्न विषयों से जुड़े ज्ञान का पर्याप्त भंडार इंटरनेट पर हिंदी में भी देखा जा सकता है जो कंप्यूटर, तकनीकी और सूचना प्रौद्योगिकी के सभी पक्षों से संबंधित हैं। इन्हें गूगल सर्च या वेबसाइट के नाम से खोजा जा सकता है।
3. हिंदी विकिपीडिया
हिंदी विकिपीडिया, विकिपीडिया का हिंदी भाषा का संस्करण है, जिसका स्वमित्व विकिमीडिया संस्थान के पास है। हिंदी संस्करण जुलाई 2003 में आरम्भ किया गया था, और 31 अगस्त 2011 तक इसमें 1,0,013 से अधिक वैध लेख और लगभग 51,220 से अधिक पंजीकृत सदस्य हैं। इसी दिन यह एक लाख लेखों का आँकड़ा पार करने वाला प्रथम भारतीय भाषा विकिपीडिया बना।– 

4. स्वास्थ्य और चिकित्सा
चिकित्सा (medical) एक ऐसा क्षेत्र है जिसका कामकाज सामान्यतः अंग्रेजी में ही होता है। यह सभी प्रकार के लोगों की मूल आवश्यकता है। इसलिए इससे संबंधित सामग्री का आम आदमी की भाषा में होना नितांत आवश्यक है। वर्तमान में हिंदी में अनेक वेबसाइटें हैं, जिन पर भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगों और उनकी चिकित्सा संबंधी जानकारियाँ उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए कुछ को देखा जा सकता है-
4.1 http://jkhealthworld.com/hindi/ : इस वेबसाइट पर आयुर्वेद, होम्योपैथ, प्राकृतिक चिकित्सा और हेल्थ से जुड़े अनेक क्षेत्रों की जानकारियाँ सरल भाषा में उपलब्ध हैं। अतः यह वेबसाइट विभिन्न प्रकार के रोगों और उनके इलाजों के बारे में हिंदी माध्यम से उपलब्ध कराते हुए चिकित्सा के क्षेत्र में हिंदी को संपन्न बनाने का कार्य कर रही है- 

4.2 http://www.onlymyhealth.com/hindi.html : हमारी वर्तमान जीवनशैली के कारण होने वाली प्रमुख बिमारियों और विभिन्न गंभीर रोगों, जैसे- अर्थराइटिस, कैंसर, डायबिटीज, बी.पी.,थायराइड, माइग्रेन आदि के बारे में और उनके इलाज में जानने के लिए यह एक उपयुक्त वेबसाइट है। साथ ही इस पर डाइट और फिटनेस, हेयर और ब्यूटी, गर्भावस्था और परवरिश संबंधी महत्वपूर्ण बातें भी दी गई हैं। इसी प्रकार कुछ अन्य वेबसाइटों को भी देखा जा सकता है-




इसी प्रकार विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के ऑनलाइन वर्जन पर हेल्थ से संबंधित एक लिंक रहता है, जहाँ स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी विभिन्न जानकारियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।
5. मीडिया (समाचार चैनल और समाचार पत्र)
मीडिया के क्षेत्र में हिंदी का स्थान बहुत ही उन्नत है। हिंदी माध्यम से अनेक समाचार चैनल और समाचार पत्र संपूर्ण भारत में चल रहे हैं। आज ये सभी हिंदी समाचार चैनल और समाचार पत्र ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए कुछ समाचार चैनलों के लिंक इस प्रकार हैं-


·        khabar.ndtv.com/
·        aajtak.intoday.in/
·        abpnews.abplive.in/india-news/
·        khabar.ibnlive.com/
·        zeenews.india.com/hindi/india
·        www.newsnation.in/livevideo


इसी प्रकार समाचार पत्रों के भी लिंक देखे जा सकते हैं-


·        www.jagran.com/
·        www.bhaskar.com/
·        navbharattimes.indiatimes.com/
·        www.livehindustan.com/
·        www.amarujala.com/
·        www.bbc.com/hindi


ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपलब्ध होने के कारण अब समाचार पत्रों के पास यह बाध्यता नहीं रही कि समाचारों को अगले दिन ही दिखाएँ। जैसे ही कोई घटना घटित होती है, अपने वेबपेज पर वे तुरंत अपडेट कर देते हैं और बाद में अगले दिन के अखबार में छपती है। इससे वे इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल रहे हैं।
6. मनोरंजन (सिनेमा और गीत)
हिंदी के अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार में हिंदी सिनेमा का बहुत बड़ा योगदान रहा है। आरंभ से हिंदी फिल्में और गीत विदेशियों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं। इस कारण बहुत से विदेशिओं ने प्रेरित होकर हिंदी सीखने में दिलचस्पी दिखाई। पहले इन फिल्मों और गीतों को संपूर्ण विश्व में पहुँचाना एक चुनौती भरा कार्य रहा है। इंटरनेट के आगमन के पश्चात यह समस्या खत्म हो गई। अब हम घर बैठे किसी भी फिल्म अथवा गीत को अपलोड और डाउनलोड कर सकते हैं। इस कारण हिंदी के विस्तार में अधिक गति आई है। आज हिंदी फिल्मों और गीतों के लिए अनेक वेबसाइटें उपलब्ध हैं। उदाहरणस्वरूप कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं-
हिंदी फिल्में देखने या डाउनलोड करने हेतु-




हिंदी गीत देखने या डाउनलोड करने हेतु –



7. उपसंहार

इस प्रकार, वर्तमान समय में इंटरनेट पर हिंदी में विविध प्रकार की सामग्री बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध है। इससे हिंदी आधुनिक प्रौद्योगिकी के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना संभव हो सका है। आज विश्व के किसी भी कोने में हम घर बैठे हिंदी में भाषा और साहित्य, स्वास्थ्य और चिकित्सा, समाचार और मनोरंजन संबंधी बिना किसी अवरोध के प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी संबंधी सामग्री भी प्रचुर मात्रा में ऑनलाइन उपलब्ध है। इसके लिए हजारों या लाखों की संख्या में वेबसाइटें तो हैं ही यू-ट्यूब आदि पर ऑडियो-विजुअल सामग्री में पर्याप्त मात्रा में देखी जा सकती है। यद्यपि यह सामग्री बहुत अधिक होते हुए भी विश्व अन्य प्रमुख भाषाओं, जैसे- अंग्रेजी आदि के सामने बहुत कम दिखाई पड़ती है। फिर भी ऑनलाइन हिंदी में उपलब्ध सामग्री की विशाल मात्रा को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि शुरुआत अच्छी है, बस आवश्यकता है और अधिक मनोयोग से लगकर इसे समृद्ध करने की तथा जन-जन तक पहुँचाने की।

Tuesday, May 2, 2017

कटप्पा बाहुबली के जश्न में खो गई शहादत!/स्मिता मिश्र

 कटप्पा बाहुबली के जश्न में खो गई शहादत!

 
इस समय देश गंभीर चुनौतियों से गुजर रहा है। एक तरफ जहां देश नए निजाम के नव निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहा है वहीं प्रतिक्रियावादी ताकतें देश को आगे बढ़ने से रोक रही हैं। इन चुनौतियों को प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग नजरिए से देखता और समझता है। इस समय जहां एक ओर आईपीएल का चीयर गूंज रहा है, बाहुबली और कटप्पा के संबंधों की पड़ताल के जश्न में डूबा हुआ है, वहीं छत्तीसगढ़ के सुकमा नक्सली हमले से देश के भीतरी रक्षक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। आईपीएल का जश्न मनाते-मनाते देश ने निंदा की, राजनेताओं और भारत के रत्नों ने बयान दिए, कुछ ने क्रोध से भरी कविताएं लिखी और सोशल मीडिया पर पोस्ट की। पर इनमें एक ऐसा भी निकला जिसने न बयान दिया न कविता लिखी,बस शहीद 25 जवानों के बच्चों की शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी खुद पर ली। वह न तो नेता है और न ही अभिनेता। वह है भारतीय टीम से अपदस्थ क्रिकेटर- गौतम गंभीर।
 भारत में फिल्म, राजनीति और क्रिकेट ऐसे क्षेत्र हैं जहां नाम और पैसा भरपूर है। एक गुमनाम सा  व्यक्ति क्रिकेट  या फिल्म  में आकर स्टार बन जाता  है। समाज उसे खूब पैसा और सम्मान देता है Iप्रश्न यह है कि वह स्टार समाज को वापिस क्या देता है ! समाज के प्रति अपनी उपादेयता कैसे सिद्ध करता है। यानी समाज के प्रति उसकी भी कोई जिम्मेदारी बनती है कि नहीं।

सी एस आर’ और एस.एस.आर
भारतीय कंपनी एक्ट में कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी यानि ‘सी एस आर’ सभी कंपनियों के लिए अनिवार्य किया गया है जिसमें कॉर्पोरेट घरानों को अपनी कमाई का  कुछ हिस्सा समाज की बेहतरी में लगाना अनिवार्य होता हैI यह दीगर बात है कि सार्थक कार्य कम ही दिखाई देते हैंI अब समय आ गया है कि सी.एस.आर के साथ-साथ  एस.एस.आर. यानि स्टार सोशल रिस्पांसिबिलिटी की भी बात होनी चाहिए Iइसका ताज़ा उदाहरण कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान गौतम गंभीर ने दिया जब उन्होंने सुकमा में शहीद हुए 25 सी.आर.पी.एफ. जवानों के बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने का भार लिया है।
उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ''गौतम गंभीर फाउंडेशन इन शहीदों के बच्चों की शिक्षा का खर्च उठायेगा. देश की सेवा करते हुए अपनों को खोने के दुख की तुलना एक क्रिकेट मैच हारने से कभी नहीं की जा सकती.''कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान ने कहा, ''मैंने अखबार उठाकर देखा तो मातम में डूबी सीआरपीएफ के दो जवानों की बेटियों की तस्वीर छपी थी.''  कोलकाता नाईट राइडर्स टीम के सदस्यों ने आईपीएल मैच बांह पर काली पट्टी बांधकर खेला था I 'मैन ऑफ द मैच' रहे कप्तान गौतम गंभीर  ने पुरस्कार की राशि सुकमा के शहीदों के आश्रितों को देने की घोषणा कीI  उन्होंने कहा कि ये राशि पीड़ित परिवारों के बच्चों के शिक्षा पर खर्च की जाएगी.
बढ़ी गौतम गंभीर के मुरीदों की संख्या
 गौतम गंभीर के इस अद्भुत जज्बे  की तारीफ देश भर में हुई है। नेताओं और अभिनेताओं और आम लोगों ने भी गौतम गंभीर की दरियादिली और उनकी देशभक्ति की भावना का सम्मान किया है। गौतम गंभीर के मुरीदों  में यूपी के सीएम योगी आदित्य नाथ समेत अनेक राजनेता, अभिनेता और आम आदमी शामिल हो गये हैं।योगी आदित्य नाथ ने ट्वीट करके कहा कि गौतम गंभीर पर देश को गर्व है,और ऐसे युवा देश के लोगों के प्रेरणा के पात्र हैं। योगी आदित्य नाथ ने गौतम गंभीर की तस्वीर लगाकर उस पर लिखा है, ‘भारतीय क्रिकेटर श्री गौतम गंभीर द्वारा सुकमा में शहीद हुए सी.आर.पी.एफ. के सभी 25 वीर जवानों के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी एक अनुकरणीय पहल, भारतीय युवाओं के लिये प्रेरणा तथा ऐसे युवाओं पर देश को गर्व है। भारतीय क्रिकेटर श्री गौतम गंभीर पर देश को गर्व है।
गौतम सर की सबसे लंबी और बेहतरीन पारी
ट्वीटर पर उनके प्रशंसकों की संख्या में इजाफा हुआ . तमाम प्रशंसकों ने  तारीफ करते हुए  कहा  कि गौतम गंभीर के लिए पहले देश और देश के सैनिक हैं, मैं उन्हें सैल्युट करता हूं। एक प्रशंसक ने  लिखा है कि गौतम सर आप हजार साल जियो। अब तक की सबसे लंबी और बेहतरीन पारी आज आपने खेली है। गुड वर्क सर।
कहते हैं अच्छा काम अच्छे को प्रेरित करता है ! उम्मीद है कि अन्य स्टार भी इस हीरो की प्रेरणा से स्टार सोशल रेस्पोंसिबिलिटी की और प्रेरित होंगे और क्रिकेट के मैदान पर ही नहीं बल्कि सोशल कंसर्न में भी चौके छक्के मारेंगेI 

Monday, October 31, 2016

धर्म : मैदान के अन्दर और बाहर का..


धर्म : मैदान के अन्दर और बाहर का..

खबर आई कि ईरान की राजधानी तेहरान में दिसम्बर में होने वाली एशियाई एयरगन प्रतियोगिता से भारत की दिग्गज महिला निशानेबाज़ हिना सिद्धू ने नाम वापिस ले लिया है I बात यह नहीं है कि वे अस्वस्थ है या कोई और व्यस्तता हैI दरअसल प्रतियोगिता के आयोजकों ने सभी देशों की महिला प्रतिभागियों के लिए हिजाब पहनने की अनिवार्यतः शर्त रख दी है Iइस विचित्र अनिवार्यतः के चलते हिना ने अपना नाम वापिस लिया I
 हिजाब का सम्बन्ध सीधा-सीधा धर्मं और संस्कृति से है Iलेकिन तमाम धर्म और संस्कृति से परे  खेल की एक यूनिवर्सल संस्कृति होती है I खेल के मैदान से बाहर खिलाडी की धर्म ,जाति से पहचान भले ही हो सकती हो  लेकिन जब खिलाडी खेल के मैदान के भीतर होता है तब उसकी पहचान विशुद्ध रूप से एक खिलाडी के तौर पर होती है जो अपनी टीम को जिताने का भरसक प्रयास करता है Iखेल के मैदान में उसका कोई भिन्न धर्म , संस्कृति या जाति नहीं होती Iउसका बस एक ही धर्म होता है – खेल का धर्म ,जिसमें न कोई छोटा है न बड़ा Iखेल का धर्म यही समान स्वातंत्र्य की बात सिखाता है I

इसलिए आयोजकों द्वारा प्रतियोगिता की प्रतिभागिता  की यह अनिवार्यतः शर्त खेल की मूल भावना को आहत करती है Iखेल संवाद का जरिया बनते हैं न कि अलगाववाद का Iआज जब दुनिया भर में महिलाओं को खेल के मैदान से जोड़ने की कोशिश  हो रही है,भारत में बेटी बचाओ बेटी पढाओं और खिलाओ के नारे दिए जा रहे हैं , ऐसे में हिना का इनकार एक पॉजिटिव कदम के रूप में लिया जाना चाहिए Iसाथ ही अंतर्राष्ट्रीय ओलिंपिक संघ को यह संज्ञान में लेना चाहिए ताकि खेलों में महिलाओं की आमद बढे न कि घटे I

Saturday, October 15, 2016

सोशल मीडिया का बढ़ता दायरा वरदान भी अभिशाप भी/ उमेश कुमार राय

सोशल मीडिया का बढ़ता दायरा वरदान भी अभिशाप भी
उमेश कुमार राय
एक दूसरे से संवाद का आदान-प्रदान करने के लिए कभी कबूतरों और डाकियों के जरिये पत्र भेजे जाते थे। एक पत्र को एक आदमी से दूसरे आदमी तक पहुँचने में महीनों लग जाते थे। पत्र का जवाब पाने के लिए भी महीनों इंतजार करना पड़ता था लेकिन आज सात समंदर पार बैठे लोगों के साथ सीधे बात की जा सकती है। अपना दर्द बयाँ किया जा सकता है। अपने आसपास के माहौल से अवगत करवाया जा सकता है। कहा जाये तो आज पूरी दुनिया मुट्ठी में समा गयी है और इसका पूरा श्रेय जाता है सोशल मीडिया को।
आक्सफोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक, ऐसी वेबसाइट और एप्लिकेशंस जो यूजरों (उपभोक्ताओं) को सामग्रियाँ तैयार करने और उसे साझा करने में समर्थ बनाये या सोशल नेटवर्किंग में हिस्सा लेने में समर्थ करे उसे सोशल मीडिया कहा जाता है। वीकिपीडिया के मुताबिक, सोशल मीडिया लोगों के बीच सामाजिक विमर्श है जिसके तहत वे परोक्ष समुदाय व नेटवर्क पर सूचना तैयार करते हैं, उन्हें शेयर (साझा) करते हैं या आदान-प्रदान करते हैं। कुल मिलाकर सोशल मीडिया या सोशल नेटवर्किंग साइट्स ऐसा इलेक्ट्रानिक माध्यम है जिसके जरिये लोग उक्त माध्यम में शामिल सदस्यों के साथ विचारों (इसमें तस्वीरें और वीडियो भी शामिल है) का आदान-प्रदान कर सकते हैं।
विश्वभर में लगभग 200 सोशल नेटवर्किंग साइट्स हैं जिनमें फेसबुक, ट्वीटर, आर्कुट, माई स्पेस, लिंक्डइन, फ्लिकर, इंस्टाग्राम (फोटो, वीडियो शेयरिंग साइट्स) सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। एक सर्वे के मुताबिक विश्वभर में संप्रति 1 अरब 28 करोड़ फेसबुक यूजर्स (फेसबुक इस्तेमाल करने वाले) हैं। वहीं,विश्वभर में इंस्टाग्राम यूजरों की संख्या 15 करोड़, लिंक्डइन यूजरों की संख्या 20 करोड़, माई स्पेस यूजरों की संख्या 3 करोड़ और ट्वीटर यूजरों की संख्या9 करोड़ है।
सोशल मीडिया का जन्म 1995 में माना जाता है। उस वक्त क्लासमेट्स डॉट कॉम से एक साइट शुरू की गयी थी जिसके जरिये स्कूलों, कॉलेजों, कार्यक्षेत्रों और मिलीटरी के लोग एक दूसरे से जुड़ सकते थे। यह साइट अब भी सक्रिय है। इसके बाद वर्ष 1996 में बोल्ट डॉट कॉम नाम की सोशल साइट बनायी गयी। वर्ष 1997 में एशियन एवेन्यू नाम की एक साइट शुरू की गयी थी एशियाई-अमरीकी कम्यूनिटी के लिए। सोशल मीडिया के क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव आया फेसबुक और ट्वीटर के आने से फेसबुक का जन्म 4 फरवरी 2004 में हुआ। मार्क जकरबर्ग ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए फेसबुक को डेवलप किया था। धीरे-धीरे इसका विस्तार दूसरे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक हुआ और वर्ष 2005 में अमरीका की सरहद लाँघ कर यह विश्व के दूसरे देशों में पहुँच गया। ऐसी ही कहानियाँ दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स की भी हैं।
शुरू में ये साइट्स मध्यवर्ग की पहुँच से दूर थे लेकिन मोबाइल फोन पर जब ये सेवाएँ मिलनी शुरू हुईं तो इस वर्ग ने इसे अपने सीने से लगा लिया। पिछले वर्ष अप्रैल में जारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में लगभग 1 करोड़ एक्टिव फेसबुक यूजर्स हैं और आने वाले समय में इनकी संख्या 10 करोड़ तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।
सोशल मीडिया इन दिनों लोकप्रियता के सोपान चढ़ रही है-भारत में और भारत के बाहर भी। विशेषज्ञ मानते हैं कि सोशल मीडिया आम जनता के लिए ऐसा माध्यम है जिसके जरिये वे अपने विचार ज्यादा सशक्त तरीके से रख सकते हैं। नेताजी सुभाषचंद्र की गुमशुदगी पर दी बीगेस्ट कवरअप नाम की पुस्तक लिखने वाले लेखक और जर्नलिस्ट अनुज धर कहते हैं, पिछले एक दशक में कई बड़ी खबरें सोशल मीडिया के जरिये ही लाइमलाइट में आयीं। आम आदमी को सोशल मीडिया के रूप में ऐसा टूल मिल गया है जिसके जरिये वे अपनी बात एक बड़ी आबादी तक पहुँचा सकते हैं। अनुज धर की बात सच भी है, तभी तो आम आदमी के साथ राजनेता भी फेसबुक, ट्वीटर पर आ गये हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, वित्तमंत्री अरुण जेटली, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, राजनाथ सिंह समेत तमाम नेताओं ने फेसबुक और ट्वीटर पर अपने अकाउंट्स बना लिये ताकि वे सीधे आम लोगों के साथ संपर्क साध सकें। लोकसभा चुनाव से पहले राजद सुप्रीमो और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी ट्वीटर पर आने की घोषणा की थी।
सोशल साइट्स की लोकप्रियता ही है कि कभी कम्प्यूटर का भारी विरोध करने वाले वामपंथी नेताओं को भी लोकसभा चुनाव के दौरान फेसबुक पर आना पड़ा। माकपा नेता और सांसद मो. सलीम मानते हैं कि लोगों के संवाद करने के लिए सोशल मीडिया एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उनका कहना है, सोशल मीडिया आज बहुत ही जरूरी माध्यम हो गया है। इस माध्यम के जरिये एक बड़ी आबादी से अपने विचार साझा किये जा सकते हैं। पिछले एक दशक में इस माध्यम का काफी विस्तार हुआ है। हालांकि वे मानते हैं कि राजनीति और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जनता से सीधे संपर्क साधना चाहिए न कि परोक्ष माध्यम के जरिये। उन्होंने कहा, सोशल मीडिया के जरिये लोगों से संपर्क तो हो सकता है लेकिन उनकी समस्याओं के बारे में पता नहीं चल सकता है खासकर ग्रमीण भारत में क्या चल रहा है, यह तो उनके पास जाकर ही जाना जा सकता है।
हाल के वर्षों में कई बड़े आन्दोलन सोशल मीडिया द्वारा ही शुरू किये गये। वर्ष 2011 के जनवरी महीने में फेसबुक के द्वारा ही मिस्त्र में जबरदस्त आन्दोलन किया गया। ट्यूनिशिया में भी फेसबुक के जरिये ही वहाँ की सरकार के खिलाफ आम जनता लामबंद होने लगी। हालात ऐसे हो गये कि सरकार को फेसबुक और ट्वीटर अकाउंट्स पर प्रतिबंध लगाना पड़ा लेकिन आन्दोलन नहीं रुका और वहाँ के प्रेसिडेंट मुबारक को मजबूर होकर इस्तीफा दे देना पड़ा।
सामाजिक कार्यकर्ता से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के चुनाव में भारी सफलता मिली तो इसका श्रेय फेसबुक को भी जाता है। अपने देश में लोकसभा चुनाव को लेकर फेसबुक के जरिये भी खूब प्रचार हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ माह पहले सभी मंत्रालयों और मंत्रियों को सोशल मीडिया पर आने को कहा ताकि मंत्रालय के कामकाज के बारे में लोग जान सकें और काम में भी पारदर्शिता बनी रहे। फेसबुक ने लंबे अरसे से बिछड़े पिता-बेटी, भाई-बहन और दोस्तों को मिलवाने का भी काम किया।
कहते हैं कि हर चीज के दो पहलू होते हैं-अच्छा और बुरा। कई तरह की खूबियों के लिए प्रसिद्धी पाने वाली सोशल मीडिया अपवाद नहीं है।
सोशल मीडिया के जरिये आपराधिक गतिविधियों को को भी अंजाम दिये जाने लगा है। वर्ष 2013 में देशभर में इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट और इंडियन पैनल कोड की धाराओं के तहत 5212 मामले दर्ज किये गये थे। इनमें से 1203 मामले सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक सामग्रियाँ डालने से संबंधित हैं। आपराधिक प्रवृत्ति के लोग येन-केन-प्रकारेण दूसरों के अकाउंट्स को हैक कर आपत्तिजनक तस्वीरें और अन्य सामग्रियाँ डालकर दुश्मनी निकाल रहे हैं।

इधर, कम उम्र के बच्चों ने भी फेसबुक का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है जिसका उन पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। पिछले दिनों ऐसोचैम की ओर से किये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक, जितने बच्चे फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं उनमें से 73 प्रतिशत बच्चों की उम्र 8 से 13 साल (13 साल से कम उम्र के बच्चों पर फेसबुक अकाउंट खोलने पर प्रतिबंध है) के बीच है। सर्वे में कहा गया है कि अधिकांश बच्चों के परिजन नौकरीपेशा हैं और वे अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं लिहाजा ये बच्चे फेसबुक और अन्य सोशल साइट्स पर मशगूल रहने लगे हैं क्योंकि सोशल मीडिया उन्हें एक ऐसा समाज देता है जिससे वे अपनी बातें शेयर कर सकते हैं।
सोशल साइट्स  के इस्तेमाल के मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी खतरनाक हैं। मनोरोग चिकित्सकों का कहना है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स के ज्यादा इस्तेमाल करने से लोग को इसका नशा लग जाता हैऔर वे अपने परिवार के प्रति प्रतिबद्धता छोड़कर घंटों कम्प्यूटर या मोबाइल फोन से चिपके रहते हैं। एसएसकेएम अस्पताल के मनोरोग चिकित्सक सुजीत सारखेल ने कहा, सोशल मीडिया एक परोक्ष माध्यम है। इसके इस्तेमाल से लोग परोक्ष  रूप से तो लोगों से जुड़े रहते हैं लेकिन वो जो असल समाज है उससे वे अलग-थलग पड़ जाते हैं। इसका असर यह होता है कि उनमें सामाजिक गुणों का विकास नहीं हो पाता है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया में लोग अधिक व्यस्त रहते हैं जिससे वे आउटडोर एक्टिविटी नहीं कर पाते हैं। इसके अलावा अधिक देर तक बैठे रहने के कारण कई तरह की शारीरिक बीमारियाँ भी हो जाया करती हैं। सारखेल ने कहा, हाल ही में मेरे पास 3-4 मामले आये हैं जो सोशल मीडिया के एडिक्शन से जुड़े हैं। मरीजों का कहना है कि वे 10 से 12 घंटे इंटरनेट करते हुए बिताते हैं। यह नशा इतना सिर चढ़कर बोलता है कि वे अपने परिवार को समय नहीं दे पा रहे हैं। उनके परिवार वाले जब इसका विरोध करते हैं तो वे आक्रामक हो जाते हैं और तो और अगर इंटरनेट ठीक से काम नहीं करता है तो वे गुस्से में आकर घर के सामान भी तोड़ने लगते हैं।
पता चला है कि महानगर में दो-एक जल्द ही सोशल मीडिया एडिक्ट के इलाज के लिए डी-एडिक्शन सेंटर खुलने जा रहा है। इससे साफ है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल अब बीमारी का रूप ले रहा है।
बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं है कि सोशल मीडिया आज लोगों के लिए बहुत ही आवश्यक हो गया है लेकिन इसका जो दूसरा पहलू है उससे बचने की जरूरत है क्योंकि जब किसी भी चीज का दुरुपयोग होने लगता है तो वो वरदान नहीं अभिशाप बन जाता है।
 Dr Smita Mishra

सोशल मीडिया का बढ़ता दायरा वरदान भी अभिशाप भी/ उमेश कुमार राय

सोशल मीडिया का बढ़ता दायरा वरदान भी अभिशाप भी
उमेश कुमार राय
एक दूसरे से संवाद का आदान-प्रदान करने के लिए कभी कबूतरों और डाकियों के जरिये पत्र भेजे जाते थे। एक पत्र को एक आदमी से दूसरे आदमी तक पहुँचने में महीनों लग जाते थे। पत्र का जवाब पाने के लिए भी महीनों इंतजार करना पड़ता था लेकिन आज सात समंदर पार बैठे लोगों के साथ सीधे बात की जा सकती है। अपना दर्द बयाँ किया जा सकता है। अपने आसपास के माहौल से अवगत करवाया जा सकता है। कहा जाये तो आज पूरी दुनिया मुट्ठी में समा गयी है और इसका पूरा श्रेय जाता है सोशल मीडिया को।
आक्सफोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक, ऐसी वेबसाइट और एप्लिकेशंस जो यूजरों (उपभोक्ताओं) को सामग्रियाँ तैयार करने और उसे साझा करने में समर्थ बनाये या सोशल नेटवर्किंग में हिस्सा लेने में समर्थ करे उसे सोशल मीडिया कहा जाता है। वीकिपीडिया के मुताबिक, सोशल मीडिया लोगों के बीच सामाजिक विमर्श है जिसके तहत वे परोक्ष समुदाय व नेटवर्क पर सूचना तैयार करते हैं, उन्हें शेयर (साझा) करते हैं या आदान-प्रदान करते हैं। कुल मिलाकर सोशल मीडिया या सोशल नेटवर्किंग साइट्स ऐसा इलेक्ट्रानिक माध्यम है जिसके जरिये लोग उक्त माध्यम में शामिल सदस्यों के साथ विचारों (इसमें तस्वीरें और वीडियो भी शामिल है) का आदान-प्रदान कर सकते हैं।
विश्वभर में लगभग 200 सोशल नेटवर्किंग साइट्स हैं जिनमें फेसबुक, ट्वीटर, आर्कुट, माई स्पेस, लिंक्डइन, फ्लिकर, इंस्टाग्राम (फोटो, वीडियो शेयरिंग साइट्स) सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। एक सर्वे के मुताबिक विश्वभर में संप्रति 1 अरब 28 करोड़ फेसबुक यूजर्स (फेसबुक इस्तेमाल करने वाले) हैं। वहीं,विश्वभर में इंस्टाग्राम यूजरों की संख्या 15 करोड़, लिंक्डइन यूजरों की संख्या 20 करोड़, माई स्पेस यूजरों की संख्या 3 करोड़ और ट्वीटर यूजरों की संख्या9 करोड़ है।
सोशल मीडिया का जन्म 1995 में माना जाता है। उस वक्त क्लासमेट्स डॉट कॉम से एक साइट शुरू की गयी थी जिसके जरिये स्कूलों, कॉलेजों, कार्यक्षेत्रों और मिलीटरी के लोग एक दूसरे से जुड़ सकते थे। यह साइट अब भी सक्रिय है। इसके बाद वर्ष 1996 में बोल्ट डॉट कॉम नाम की सोशल साइट बनायी गयी। वर्ष 1997 में एशियन एवेन्यू नाम की एक साइट शुरू की गयी थी एशियाई-अमरीकी कम्यूनिटी के लिए। सोशल मीडिया के क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव आया फेसबुक और ट्वीटर के आने से फेसबुक का जन्म 4 फरवरी 2004 में हुआ। मार्क जकरबर्ग ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए फेसबुक को डेवलप किया था। धीरे-धीरे इसका विस्तार दूसरे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक हुआ और वर्ष 2005 में अमरीका की सरहद लाँघ कर यह विश्व के दूसरे देशों में पहुँच गया। ऐसी ही कहानियाँ दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट्स की भी हैं।
शुरू में ये साइट्स मध्यवर्ग की पहुँच से दूर थे लेकिन मोबाइल फोन पर जब ये सेवाएँ मिलनी शुरू हुईं तो इस वर्ग ने इसे अपने सीने से लगा लिया। पिछले वर्ष अप्रैल में जारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में लगभग 1 करोड़ एक्टिव फेसबुक यूजर्स हैं और आने वाले समय में इनकी संख्या 10 करोड़ तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।
सोशल मीडिया इन दिनों लोकप्रियता के सोपान चढ़ रही है-भारत में और भारत के बाहर भी। विशेषज्ञ मानते हैं कि सोशल मीडिया आम जनता के लिए ऐसा माध्यम है जिसके जरिये वे अपने विचार ज्यादा सशक्त तरीके से रख सकते हैं। नेताजी सुभाषचंद्र की गुमशुदगी पर दी बीगेस्ट कवरअप नाम की पुस्तक लिखने वाले लेखक और जर्नलिस्ट अनुज धर कहते हैं, पिछले एक दशक में कई बड़ी खबरें सोशल मीडिया के जरिये ही लाइमलाइट में आयीं। आम आदमी को सोशल मीडिया के रूप में ऐसा टूल मिल गया है जिसके जरिये वे अपनी बात एक बड़ी आबादी तक पहुँचा सकते हैं। अनुज धर की बात सच भी है, तभी तो आम आदमी के साथ राजनेता भी फेसबुक, ट्वीटर पर आ गये हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, वित्तमंत्री अरुण जेटली, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, राजनाथ सिंह समेत तमाम नेताओं ने फेसबुक और ट्वीटर पर अपने अकाउंट्स बना लिये ताकि वे सीधे आम लोगों के साथ संपर्क साध सकें। लोकसभा चुनाव से पहले राजद सुप्रीमो और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी ट्वीटर पर आने की घोषणा की थी।
सोशल साइट्स की लोकप्रियता ही है कि कभी कम्प्यूटर का भारी विरोध करने वाले वामपंथी नेताओं को भी लोकसभा चुनाव के दौरान फेसबुक पर आना पड़ा। माकपा नेता और सांसद मो. सलीम मानते हैं कि लोगों के संवाद करने के लिए सोशल मीडिया एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उनका कहना है, सोशल मीडिया आज बहुत ही जरूरी माध्यम हो गया है। इस माध्यम के जरिये एक बड़ी आबादी से अपने विचार साझा किये जा सकते हैं। पिछले एक दशक में इस माध्यम का काफी विस्तार हुआ है। हालांकि वे मानते हैं कि राजनीति और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जनता से सीधे संपर्क साधना चाहिए न कि परोक्ष माध्यम के जरिये। उन्होंने कहा, सोशल मीडिया के जरिये लोगों से संपर्क तो हो सकता है लेकिन उनकी समस्याओं के बारे में पता नहीं चल सकता है खासकर ग्रमीण भारत में क्या चल रहा है, यह तो उनके पास जाकर ही जाना जा सकता है।
हाल के वर्षों में कई बड़े आन्दोलन सोशल मीडिया द्वारा ही शुरू किये गये। वर्ष 2011 के जनवरी महीने में फेसबुक के द्वारा ही मिस्त्र में जबरदस्त आन्दोलन किया गया। ट्यूनिशिया में भी फेसबुक के जरिये ही वहाँ की सरकार के खिलाफ आम जनता लामबंद होने लगी। हालात ऐसे हो गये कि सरकार को फेसबुक और ट्वीटर अकाउंट्स पर प्रतिबंध लगाना पड़ा लेकिन आन्दोलन नहीं रुका और वहाँ के प्रेसिडेंट मुबारक को मजबूर होकर इस्तीफा दे देना पड़ा।
सामाजिक कार्यकर्ता से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के चुनाव में भारी सफलता मिली तो इसका श्रेय फेसबुक को भी जाता है। अपने देश में लोकसभा चुनाव को लेकर फेसबुक के जरिये भी खूब प्रचार हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ माह पहले सभी मंत्रालयों और मंत्रियों को सोशल मीडिया पर आने को कहा ताकि मंत्रालय के कामकाज के बारे में लोग जान सकें और काम में भी पारदर्शिता बनी रहे। फेसबुक ने लंबे अरसे से बिछड़े पिता-बेटी, भाई-बहन और दोस्तों को मिलवाने का भी काम किया।
कहते हैं कि हर चीज के दो पहलू होते हैं-अच्छा और बुरा। कई तरह की खूबियों के लिए प्रसिद्धी पाने वाली सोशल मीडिया अपवाद नहीं है।
सोशल मीडिया के जरिये आपराधिक गतिविधियों को को भी अंजाम दिये जाने लगा है। वर्ष 2013 में देशभर में इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट और इंडियन पैनल कोड की धाराओं के तहत 5212 मामले दर्ज किये गये थे। इनमें से 1203 मामले सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक सामग्रियाँ डालने से संबंधित हैं। आपराधिक प्रवृत्ति के लोग येन-केन-प्रकारेण दूसरों के अकाउंट्स को हैक कर आपत्तिजनक तस्वीरें और अन्य सामग्रियाँ डालकर दुश्मनी निकाल रहे हैं।

इधर, कम उम्र के बच्चों ने भी फेसबुक का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है जिसका उन पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। पिछले दिनों ऐसोचैम की ओर से किये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक, जितने बच्चे फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं उनमें से 73 प्रतिशत बच्चों की उम्र 8 से 13 साल (13 साल से कम उम्र के बच्चों पर फेसबुक अकाउंट खोलने पर प्रतिबंध है) के बीच है। सर्वे में कहा गया है कि अधिकांश बच्चों के परिजन नौकरीपेशा हैं और वे अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं लिहाजा ये बच्चे फेसबुक और अन्य सोशल साइट्स पर मशगूल रहने लगे हैं क्योंकि सोशल मीडिया उन्हें एक ऐसा समाज देता है जिससे वे अपनी बातें शेयर कर सकते हैं।
सोशल साइट्स  के इस्तेमाल के मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी खतरनाक हैं। मनोरोग चिकित्सकों का कहना है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स के ज्यादा इस्तेमाल करने से लोग को इसका नशा लग जाता हैऔर वे अपने परिवार के प्रति प्रतिबद्धता छोड़कर घंटों कम्प्यूटर या मोबाइल फोन से चिपके रहते हैं। एसएसकेएम अस्पताल के मनोरोग चिकित्सक सुजीत सारखेल ने कहा, सोशल मीडिया एक परोक्ष माध्यम है। इसके इस्तेमाल से लोग परोक्ष  रूप से तो लोगों से जुड़े रहते हैं लेकिन वो जो असल समाज है उससे वे अलग-थलग पड़ जाते हैं। इसका असर यह होता है कि उनमें सामाजिक गुणों का विकास नहीं हो पाता है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया में लोग अधिक व्यस्त रहते हैं जिससे वे आउटडोर एक्टिविटी नहीं कर पाते हैं। इसके अलावा अधिक देर तक बैठे रहने के कारण कई तरह की शारीरिक बीमारियाँ भी हो जाया करती हैं। सारखेल ने कहा, हाल ही में मेरे पास 3-4 मामले आये हैं जो सोशल मीडिया के एडिक्शन से जुड़े हैं। मरीजों का कहना है कि वे 10 से 12 घंटे इंटरनेट करते हुए बिताते हैं। यह नशा इतना सिर चढ़कर बोलता है कि वे अपने परिवार को समय नहीं दे पा रहे हैं। उनके परिवार वाले जब इसका विरोध करते हैं तो वे आक्रामक हो जाते हैं और तो और अगर इंटरनेट ठीक से काम नहीं करता है तो वे गुस्से में आकर घर के सामान भी तोड़ने लगते हैं।
पता चला है कि महानगर में दो-एक जल्द ही सोशल मीडिया एडिक्ट के इलाज के लिए डी-एडिक्शन सेंटर खुलने जा रहा है। इससे साफ है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल अब बीमारी का रूप ले रहा है।
बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं है कि सोशल मीडिया आज लोगों के लिए बहुत ही आवश्यक हो गया है लेकिन इसका जो दूसरा पहलू है उससे बचने की जरूरत है क्योंकि जब किसी भी चीज का दुरुपयोग होने लगता है तो वो वरदान नहीं अभिशाप बन जाता है।