Saturday, September 25, 2021

गुजराती साहित्य

 

अंतिम पृष्ठ से पहले का क्रम है यह .कृपया पहले पेज के लिए अंतिम फाइल पर जाये 


















Friday, September 3, 2021

पाजेब .जैनेन्द्र कुमार

जयशंकर प्रसाद की छोटा जादूगर

 

इस कहानी के लेखक श्री जयशंकर प्रसाद हैं। इस कहानी में एक बालक का माता के प्रति प्रेम, व्यवहार की कुशलता और परिश्रम से जीवन बिताने का वर्णन है। लेखक बड़े दिन की छुट्टियों में कोलकाता घूमने गया। वहाँ एक मेले में उसने एक तेरह-चौदह वर्ष के बालक को देखा। वह जादू के छोटे-छोटे खेल दिखाकर अपनी बीमार माँ का इलाज कराता था। कहानी का अंत छोटे-जादूगर की बाँहों में उसकी माँ के निधन के साथ होता है।

इस पाठ का शीर्षक छोटा जादूगरपूरी तरह उपयुक्त है। पूरी कहानी उस छोटे बालक के आस-पास घूमती है जो जादू का खेल दिखाकर अपनी बीमार माँ के उपचार के लिए और अपना पेट भरने के लिए कुछ पैसे कमा लेता है। आयु में छोटा होते हुए भी उसमें एक कुशल जादूगर जैसी प्रतिभा है। इस पाठ का अन्य शीर्षक पुरुषार्थी बालकया छोटा श्रवणहो सकता है।

चरित्र --छोटा जादूगर इस कहानी का प्रमुख पात्र है। उसके चरित्र में अनेक गुण दिखाई देते हैं। वह पुरुषार्थी बालक है। अपने और अपनी माँ के जीवनयापन के लिए वह अपनी जादू कला से पैसा कमाता है। निर्धन होते हुए भी वह किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता। कठिनाइयों का सामना करते हुए स्वाभिमान के साथ जीवन बिताना चाहता है। लेखक के व्यंग्य करने पर वह गर्व से कहता है तमाशा देखने नहीं, दिखाने आया हूँ।उसमें एक कुशल जादूगर बनने के सभी गुण हैं। वह वाचाल है और आत्मविश्वास से पूर्ण है। निर्जीव खिलौने से वह ऐसा खेल दिखाता है कि सभी हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते हैं। उसका सबसे बड़ा
गुण है उसकी मातृ-भक्ति। माँ के लिए ही वह परिश्रम से पैसे कमाता है। माँ की मृत्यु पर उसकी करुण दशा सभी के हृदय को द्रवित कर देती है।

इस कहानी में लेखक ने एक निर्धन माँ-बाप के स्नेह से वंचित बालक के कठिनाइयों से जूझते हुए जीने की झाँकी प्रस्तुत की है। माँ बीमार है और पिता जेल में हैं। लेकिन बालक हार नहीं मानता। किसी के समाने हाथ नहीं फैलाता। अपने परिश्रम और चतुराई से स्वाभिमान के साथ जीना चाहता है। लेखक इस कहानी से बालकों को आत्मविश्वास, स्वाभिमान और परिश्रम की तथा माता-पिता की सेवा करने का संदेश देना चाहता है।II. इस कहानी से हमें कठिनाइयों से निराश न होने और कला-कौशल, परिश्रम और चतुराई से जीवनयापन करने की प्रेरणा मिलती है। इसके साथ ही माता-पिता की सेवा करने तथा स्वाभिमान के साथ जीने की प्रेरणा भी प्राप्त होती है।

और तुम तमाशा देख रहे हो लेखक के इन शब्दों ने छोटे जादूगर (लड़के) के दिल को चोट पहुँचाई। उसने कहा कि वह वहाँ तमाशा देखने नहीं दिखाने आया था ताकि कुछ पैसे कमाकर माँ के पथ्य (भोजन) को प्रबन्ध कर सके।लेखक ने जब छोटे जादूगर से उसके परिवार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि घर में उसके पिता और बीमार माँ थी। पिता देश के लिए जेल में थे और बीमार माँ घर में, लेखक ने लड़के पर व्यंग्य करते हुए यह बात कही। 

छोटा जादूगरकहानी प्रसादजी की उद्देश्यपूर्ण रचना है। छोटा जादूगर के पिता जेल में है। उनकी देश के लिये जेल यात्री पर उसको गर्व है उसकी माता बीमारी से पीड़ित है। माँ की दवा और पथ्य के लिए पैसा चाहिए। अपने भरण-पोषण के लिए भी धन चाहिए। अवयस्क जादूगर यह जानता है। अपनी कच्ची उम्र में ही वह पैसा कमाने निकल पड़ता है और छोटा जादूगर बन जाता है। असहाय बालक किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता। वह अपनी निर्धनता का उल्लेख कर भीख नहीं माँगता।

पूँजी के अभाव में व्यापार हो नहीं सकता। जादूगर बनना उसके बुद्धि के कौशल का प्रमाण है वह संघर्ष करके जीवन बिताने का साहस दिखाता है वह बालसुलभ करुणा के साथ दायित्व बोध का परिचय देता है। छोटा जादूगर के इन मानवीय गुणों का उद्घाटन कर आत्मनिर्भरता और दायित्व बोध का संदेश देना ही कहानी का उद्देश्य है।


जयशंकर प्रसाद की कहानियाँ

 

कथा के क्षेत्र में प्रसाद जी आधुनिक ढंग की कहानियों के स्तम्भ  माने जाते हैं। सन्‌ १९१२ ई. में 'इन्दु' में उनकी पहली कहानी 'ग्राम' प्रकाशित हुई।] उनके पाँच कहानी-संग्रहों में कुल मिलाकर सत्तर कहानियाँ संकलित हैं। 'चित्राधार' से संकलित 'उर्वशी' और 'बभ्रुवाहन' को मिलाकर उनकी कुल कहानियों की संख्या ७२ बतला दी जाती है। यह 'उर्वशी' 'उर्वशी चम्पू' से भिन्न है, परन्तु ये दोनों रचनाएँ भी गद्य-पद्य मिश्रित भिन्न श्रेणी की रचनाएँ ही हैं। 'चित्राधार' में तो कथा-प्रबन्ध के रूप में पाँच और रचनाएँ भी संकलित हैंजिनको मिलाकर कहानियों की कुल संख्या ७७ हो जाएँगी; परंतु कुछ अंशों में कथा-तत्त्व से युक्त होने के बावजूद स्वयं जयशंकर प्रसाद की मान्यता के अनुसार ये रचनाएँ 'कहानी' विधा के अंतर्गत नहीं आती हैं। अतः उनकी कुल कहानियों की संख्या सत्तर है।

कहानी के सम्बन्ध में प्रसाद जी की अवधारणा का स्पष्ट संकेत उनके प्रथम कहानी-संग्रह 'छाया' की भूमिका में मिल जाता है। 'छाया' नाम का स्पष्टीकरण देते हुए वे जो कुछ कहते हैं वह काफी हद तक 'कहानी' का परिभाषात्मक स्पष्टीकरण बन गया है। प्रसाद जी का मानना है कि छोटी-छोटी आख्यायिका में किसी घटना का पूर्ण चित्र नहीं खींचा जा सकता। परंतु, उसकी यह अपूर्णता कलात्मक रूप से उसकी सबलता ही बन जाती है क्योंकि वह मानव-हृदय को अर्थ के विभिन्न आयामों की ओर प्रेरित कर जाती है। प्रसाद जी के शब्दों में "...कल्पना के विस्तृत कानन में छोड़कर उसे घूमने का अवकाश देती है जिसमें पाठकों को विस्तृत आनन्द मिलता है।" 'आनन्द' के साथ इस 'विस्तृत' विश्लेषण में निश्चय ही अर्थ की बहुआयामी छवि सन्निहित है; और इसीलिए छोटी कहानी भी केवल विनोद के लिए न होकर हृदय पर गम्भीर प्रभाव डालने वाली होती है। आज भी कहानी के सन्दर्भ में प्रसाद जी की इस अवधारणा की प्रासंगिकता अक्षुण्ण बनी हुई है, बल्कि बढ़ी ही है।

कवि एवं नाटककार के रूप में आधुनिक हिन्दी साहित्य में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर अधिष्ठित होने के कारण प्रसाद जी की कहानियों पर लम्बे समय तक समीक्षकों ने उतना ध्यान नहीं दिया, जितना कि अपेक्षित था; जबकि विजयमोहन सिंह के शब्दों में :

"साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में समान प्रतिभा तथा क्षमता के साथ अधिकार रखने वाले प्रसाद जी ने सर्वाधिक प्रयोगात्मकता कहानी के क्षेत्र में ही प्रदर्शित की है। मुख्य रूप से उनके शिल्प प्रयोग विलक्षण हैं।"

छायावादी और आदर्शवादी माने जाने वाले जयशंकर प्रसाद की पहली ही कहानी 'ग्राम' आश्चर्यजनक रूप से यथार्थवादी है। भले ही उनकी यह कहानी हिन्दी की पहली कहानी न हो, परन्तु इसे सामान्यतः हिन्दी की पहली 'आधुनिक कहानी' माना जाता है। इसमें ग्रामीण यथार्थ का वह पक्ष अभिव्यक्त हुआ है जिसकी उस युग में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इस कहानी में महाजनी सभ्यता के अमानवीय पक्ष का जिस वास्तविकता के साथ उद्घाटन हुआ है वह प्रसाद जी की सूक्ष्म और सटीक वस्तुवादी दृष्टि का परिचायक है।

सामान्यतः प्रसाद जी को सामन्ती अभिरुचि का रचनाकार मानने की भूल भी की जाती रही है, जबकि एक ओर प्रसाद जी 'ममता' कहानी में "पतनोन्मुख सामन्त वंश का अन्त समीप" बतलाते हैं तो दूसरी ओर अपनी शिखर कृति 'कामायनी' में 'देव संस्कृति' के विनाश को उसकी आन्तरिक कमियों के कारण ही स्वाभाविक मानते हैं। 'देव संस्कृति' और 'स्वर्ग की परिकल्पना' को प्रसाद जी अपनी कहानी 'स्वर्ग के खण्डहर में' भी ध्वस्त कर डालते हैं। इस कहानी में दुर्दान्त शेख से बिना डरे लज्जा कहती है "स्वर्ग ! इस पृथ्वी को स्वर्ग की आवश्यकता क्या है, शेख ? ना, ना, इस पृथ्वी को स्वर्ग के ठेकेदारों से बचाना होगा। पृथ्वी का गौरव स्वर्ग बन जाने से नष्ट हो जायगा। इसकी स्वाभाविकता साधारण स्थिति में ही रह सकती है। पृथ्वी को केवल वसुंधरा होकर मानव जाति के लिए जीने दो, अपनी आकांक्षा के कल्पित स्वर्ग के लिए, क्षुद्र स्वार्थ के लिए इस महती को, इस धरणी को नरक न बनाओ, जिसमें देवता बनने के प्रलोभन में पड़कर मनुष्य राक्षस न बन जाय, शेख।" यदि इस कहानी के ध्वन्यर्थ को इसके बाद हुए द्वितीय विश्वयुद्ध की परिणति से भी जोड़ कर देखें तो प्रसाद जी की सर्जनात्मक दृष्टि की महत्ता और भी सहजता से समझ में आ सकती है।

वस्तुतः प्रसाद जी ने हिन्दी कहानी को अपने विशिष्ट योगदान के रूप में प्रेम की तीव्रता और प्रतीति के साथ कहानीपन को बनाए रखते हुए आन्तरिकता और अन्तर्मुखता के आयाम ही नहीं दिये बल्कि वास्तविकता के दोहरे स्वरूपों और जटिलताओं को पकड़ने, दरसाने और प्रस्तुत करने के लिए हिन्दी कहानी को सक्षम भी बनाया। डॉ॰ सत्यप्रकाश मिश्र के शब्दों में :

"हिन्दी कहानी में प्रसाद का योगदान दृश्य प्रधान चित्रात्मकता और नाटकीयता के संरचनात्मक तत्त्वों के कारण ही नहीं है बल्कि इनके माध्यम से उस आन्तरिक संघर्ष और द्वन्द्व को अभिव्यक्त करने की क्षमता प्रदान करने में है, जो प्रसाद के पूर्व नहीं था। हिन्दी कहानी में संश्लिष्टता और भावों के अंकन की सूक्ष्मता प्रसाद ने ही विकसित की।"