Friday, September 3, 2021

संगम युग

परिचय

दक्षिण भारत (कृष्णा एवं तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में स्थित क्षेत्र) में लगभग तीन सौ ईसा पूर्व से तीन सौ ईस्वी के बीच की अवधि को संगम काल के नाम से जाना जाता है।

  • संगम तमिल कवियों का एक संगम या सम्मलेन था, जो संभवतः किन्हीं प्रमुखों या राजाओं के संरक्षण में ही आयोजित होता था।
  • आठवीं सदी ई. में तीन संगमों का वर्णन मिलता है। पाण्ड्य राजाओं द्वारा इन संगमों को शाही संरक्षण प्रदान किया गया।
  • ये साहित्यिक रचनाएँ द्रविड़ साहित्य के शुरुआती नमूने थे।
  • तमिल किंवदंतियों के अनुसार, प्राचीन दक्षिण भारत में तीन संगमों (तमिल कवियों का समागम) का आयोजन किया गया था, जिसे मुच्चंगम (Muchchangam) कहा जाता था।
    • माना जाता है कि प्रथम संगम मदुरै में आयोजित किया गया था। इस संगम में देवता और महान संत शामिल थे। इस संगम का कोई साहित्यिक ग्रंथ उपलब्ध नहीं है।
    • दूसरा संगम कपाटपुरम् में आयोजित किया गया था, इस संगम का एकमात्र तमिल व्याकरण ग्रंथ तोलकाप्पियम् ही उपलब्ध है।
    • तीसरा संगम भी मदुरै में हुआ था। इस संगम के अधिकांश ग्रंथ नष्ट हो गए थे। इनमें से कुछ सामग्री समूह ग्रंथों या महाकाव्यों के रूप में उपलब्ध है।

संगम साहित्य: संगम युग का विवरण देने वाला प्रमुख स्रोत

संगम साहित्य मुख्य रूप से तमिल भाषा में लिखा गया है, संगम युग की प्रमुख रचनाओं में तोलकाप्पियम्, एतुत्तौके, पत्तुप्पातु, पदिनेकिल्लकणक्कु इत्यादि ग्रंथ तथा शिलप्पादिकारम्, मणिमेखलै और जीवक चिंतामणि महाकाव्य शामिल हैं।

  • तोलकाप्पियम् के लेखक तोलकाप्पियर हैं। यह द्वितीय संगम का उपलब्ध एकमात्र प्राचीनतम ग्रंथ है। यह व्याकरण से संबंधित एक ग्रंथ है, साथ ही यह उस समय की राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की जानकारी भी प्रदान करता है।
  • एतुत्तौके (अष्ट संग्रह) एक संग्रह ग्रंथ है यह तीसरे संगम के आठ ग्रंथों का संग्रह है। ये आठ ग्रंथ निम्नलिखित हैं- नण्णिनै, कुरुन्थोकै, एनकुरुनूर, पदित्रप्पत्तु, परिपादल, कलिथौके, अहनानरु, पुरुनानरु।
  • पत्तुप्पातु (दशगीत) दस कविताओं का संग्रह है और यह तृतीय संगम का दूसरा संग्रह ग्रंथ है। ये दस कविताएँ निम्नलिखित हैं- तिरुमुरुकात्रुप्पदै, नेडनलवाडै, पेरुम्पनत्रुप्पदै, पत्तिनप्पालै, पोरुनरात्रुप्पदै, मदुरैकांचि, सिरुपानात्रुप्पदै, मुल्लैप्पातु, कुरुन्जिप्पातु, मलैपदुकदाम।
  • पदिनेकिल्लकणक्कु 18 कविताओं वाला एक आचारमूलक ग्रंथ है तथा यह तृतीय संगम साहित्य से संबंधित है। इन 18 कविताओं में महत्त्वपूर्ण कविता तमिल के महान कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर द्वारा लिखित तिरुक्कुरल है। इसे तमिल साहित्य का बाइबिल अथवा पंचम वेद भी माना जाता है।
  • शिलप्पादिकारम् ‘इलांगोआदिगल’ द्वारा और मणिमेखलै ‘सीतलैसत्तनार’ द्वारा लिखे गए महाकाव्य हैं। इन महाकाव्यों द्वारा तत्कालीन संगम समाज और राजनीति के विषय में अच्छी जानकारी प्राप्त होती है।

संगम काल के बारे में विवरण देने वाले अन्य स्रोत हैं -

  • मेगस्थनीज (Megasthenes), स्ट्रैबो (Strabo), प्लिनी (Pliny) और टॉलेमी (Ptolemy) जैसे यूनानी लेखकों ने पश्चिम तथा दक्षिण भारत के बीच वाणिज्यिक व्यापार संपर्कों के बारे में उल्लेख किया है।
  • अशोक के अभिलेखों में चोल, पाण्ड्य और चेर के बारे में बताया गया है।
  • कलिंग के खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख में तमिल राज्यों का उल्लेख है।
  • आठवीं सदी ई. में इरैयनार अगप्पोरुल के भाष्य की भूमिका में तीनों संगमो का वर्णन किया गया है।

संगम काल का राजनीतिक इतिहास

संगम युग के दौरान दक्षिण भारत पर तीन राजवंशों- चेरों, चोलों और पाण्ड्यों का शासन था। इन राज्यों के बारे में जानकारी संगम काल के साहित्यिक संदर्भों से प्राप्त की जा सकती है।

चेर

  • चेरों ने आधुनिक राज्य केरल के मध्य और उत्तरी हिस्सों तथा तमिलनाडु के कोंगु क्षेत्र को नियंत्रित किया।
  • उनकी राजधानी वांजि थी तथा पश्चिमी तट, मुसिरी और टोंडी के बंदरगाह उनके नियंत्रण में थे।
  • चेरों का प्रतीक चिह्न "धनुष-बाण" था।
  • ईसा की पहली शताब्दी के पुगलुर शिलालेख से चेर शासकों की तीन पीढ़ियों की जानकारी मिलती है।
  • चेर राजा रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार से लाभ प्राप्त करते थे। कहा जाता है कि उन्होंने ऑगस्टस का एक मंदिर भी बनवाया गया था।
  • चेरों के सबसे महान राजा शेनगुटटवन/सेंगुत्तुवन थे जिन्हें लाल या अच्छे चेर भी कहा जाता था।
  • शेनगुटटवन/सेंगुत्तुवन ने चेर राज्य में पत्तिनी (पत्नी) पूजा प्रारंभ की। इसे कण्णगी पूजा भी कहा गया।
  • वह दक्षिण भारत से चीन में दूत भेजने वाले पहले व्यक्ति थे।

चोल

  • चोलों ने तमिलनाडु के मध्य और उत्तरी भागों को नियंत्रित किया।
  • उनके शासन का मुख्य क्षेत्र कावेरी डेल्टा था, जिसे बाद में चोलमंडलम के नाम से जाना जाता था।
  • उनकी राजधानी उरैयूर (तिरुचिरापल्ली शहर के पास) थी। बाद में करिकाल ने कावेरीपत्तनम या पुहार नगर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया।
  • इनका प्रतीक चिह्न बाघ था।
  • चोलों के पास एक कुशल नौसेना भी थी।
  • चोल राजाओं में राजा करिकाल सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शासक था।
    • पत्तिनप्पालै में उनके जीवन और सैन्य अधिग्रहण को दर्शाया गया है।
    • विभिन्न संगम साहित्य की कविताओं में वेण्णि के युद्ध का उल्लेख मिलता है इस युद्ध में करिकाल ने पाण्ड्य तथा चेर सहित ग्यारह राजाओं को पराजित किया।
    • करिकाल की सैन्य उपलब्धियों ने उन्हें पूरे तमिल क्षेत्र का अधिपति बना दिया।
    • करिकाल ने अपने शासनकाल में व्यापार और वाणिज्य क्षेत्र को संपन्न बनाया।
    • करिकाल ने पुहार या कावेरीपत्तनम शहर की स्थापना की और अपनी राजधानी उरैपुर से कावेरीपत्तनम में स्थानांतरित की। इसके अतिरिक्त कावेरी नदी के किनारे 160 किमी. लंबा बांध बनवाया।

पाण्ड्य

  • पाण्ड्यों ने मदुरै से शासन किया।
  • पाण्ड्य राज्य भारतीय प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी भाग में था।
  • कोरकई इनकी प्रारंभिक राजधानी थी जो बंगाल की खाड़ी के साथ थम्परपराणी के संगम के पास स्थित थी।
  • पाण्ड्य वंश का प्रतीक चिह्न ‘मछली’ थी।
  • उन्होंने तमिल संगमों का संरक्षण किया और संगम कविताओं के संकलन की सुविधा प्रदान की।
  • शासकों ने एक नियमित सेना बनाए रखी।
  • संगम साहित्य के अनुसार, पाण्ड्य राज्य धनी और समृद्ध था।
  • पाण्ड्यों का पहला उल्लेख मेगास्थनीज ने किया है, उन्होंने इस राज्य को मोतियों के लिये प्रसिद्ध बताया था।
  • समाज में विधवाओं के साथ बुरा बर्ताव किया जाता था।
  • इस राज्य में ब्राम्हणों का काफी प्रभाव था तथा ईसा के शुरूआती शताब्दियों में पाण्ड्य रजा वैदिक यज्ञ करते थे।
  • कलभ्रस (Kalabhras) नामक जनजाति के आक्रमण के साथ उनकी शक्ति का क्षय हुआ।
  • नल्लिवकोडन संगम युग का अंतिम ज्ञात पाण्ड्य शासक था।

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संगम राजव्यवस्था और प्रशासन

  • संगम काल के दौरान वंशानुगत राजतंत्र का प्रचलन था।
  • संगम युग के प्रत्येक राजवंश के पास शाही प्रतीक था। जैसे- चोलों के लिये बाघ, पाण्ड्यों के लिये मछली और चेरों के लिये धनुष।
  • राजा की शक्ति पर पाँच परिषदों का नियंत्रण था, जिन्हें पाँच महासभाओं के नाम से जाना जाता था।
  • मंत्री (अमैच्चार), पुरोहित (पुरोहितार), दूत (दूतार), सेनापति (सेनापतियार) और गुप्तचर (ओर्रार) थे।
  • सैन्य प्रशासन का संचालन कुशलतापूर्वक किया गया जाता था और प्रत्येक शासक के साथ एक नियमित सेना जुड़ी हुई थी।
  • राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमि राजस्व था, जबकि विदेशी व्यापार पर सीमा शुल्क भी लगाया गया था।
  • युद्ध में लूटी गई संपत्ति को भी राजकोषीय आय माना जाता था।
  • डकैती और तस्करी को रोकने के लिये सड़कों और राजमार्गों की उचित व्यवस्था को बनाए रखा गया था।

संगम सोसाइटी

  • पुरुनानरु नामक ग्रंथ में चार वर्गों तुड़ियन, पाड़न, पड़ैयन और कड़म्बन का उल्लेख मिलता है।
  • पुरुनानरू नामक ग्रंथ में चार वर्गों का उल्लेख मिलता है -जैसे- शुड्डुम वर्ग (ब्राह्मण एवं बुद्धिजीवी वर्ग), अरसर वर्ग (शासक एवं योद्धा वर्ग), बेनिगर वर्ग (व्यापारी वर्ग) और वेल्लाल वर्ग (किसान वर्ग)।
  • संगम कविताओं में भूमि के पाँच मुख्य प्रकार पाए जाते हैं - मुल्लै (देहाती), मरुदम (कृषि), पालै (रेगिस्तान), नेथल (समुद्रवर्ती) और कुरिंचि (पहाड़ी)।
  • प्राचीन आदिम जनजातियाँ जैसे- थोडा, इरुला, नागा और वेदर इस काल में पाई जाती थीं।
  • एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इस युग में दास-प्रथा का आभाव था।

संगम युग के दौरान महिलाओं की स्थिति

  • संगम युग के दौरान की महिलाओं की स्थिति को समझने के लिये संगम साहित्य में काफी जानकारी उपलब्ध है।
  • महिलाओं का सम्मान किया जाता था और उन्हें बौद्धिक गतिविधियों के संचालन की अनुमति थी। ओबैयार (Avvaiyar), नच्चेलियर (Nachchellaiyar) और काकईपाडिन्यार (Kakkaipadiniyar) जैसी महिला कवयित्री थीं, जिन्होंने तमिल साहित्य में उत्कर्ष योगदान दिया।
  • महिलाओं को अपन जीवन साथी चुनने की अनुमति थी लेकिन विधवाओं का जीवन दयनीय था।
  • समाज में उच्च स्तर पर सती प्रथा के प्रचलन का उल्लेख मिलता है।

धर्म

  • संगम काल के प्रमुख देवता मुरुगन थे, जिन्हें तमिल भगवान के रूप में जाना जाता है।
  • दक्षिण भारत में मुरुगन की पूजा सबसे प्राचीन मानी जाती है और भगवान मुरुगन से संबंधित त्योहारों का संगम साहित्य में उल्लेख किया गया था।
  • संगम काल के दौरान पूजे जाने वाले अन्य देवता मयोन (विष्णु), वंदन (इंद्र), कृष्ण, वरुण और कोर्रावई थे।
  • संगम काल में नायक पाषाण काल ​​की पूजा महत्त्वपूर्ण थी जो युद्ध में योद्धाओं द्वारा दिखाए गए शौर्य की स्मृति के रूप में चिह्नित किये गए थे।
  • संगम युग में बौद्ध धर्म और जैन धर्म का भी प्रसार दिखाई पड़ता है।

संगम युग की अर्थव्यवस्था

  • कृषि मुख्य व्यवसाय था और चावल सबसे आम फसल थी।
  • हस्तकला में बुनाई, धातु के काम और बढ़ईगीरी, जहाज़ निर्माण और मोतियों, पत्थरों तथा हाथी दाँत का उपयोग करके आभूषण बनाना शामिल था।
  • संगम युग की महत्त्वपूर्ण विशेषता इसका आंतरिक और बाहरी व्यापार था।
  • सूती और रेशमी कपड़ों की कताई एवं बुनाई में उच्च विशेषज्ञता प्राप्त थी। पश्चिमी देशों में विशेष रूप से उरियुर में बुने हुए सूती कपड़ों की बहुत मांग थी।
  • पुहार शहर विदेशी व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण स्थान बन गया, क्योंकि कीमती सामान वाले बड़े जहाज़ इस बंदरगाह में प्रवेश करते थे।
  • वाणिज्यिक गतिविधि के लिये अन्य महत्वपूर्ण बंदरगाह तोंडी, मुशिरी, कोरकई, अरिकमेडु और मरक्कानम थे।
  • ऑगस्टस, टाइबेरियस और नीरो जैसे रोमन सम्राटों द्वारा जारी किये गए कई सोने और चाँदी के सिक्के तमिलनाडु के सभी हिस्सों में पाए गए हैं जो समृद्ध व्यापार का संकेत देते हैं।
  • संगम युग के प्रमुख निर्यात में सूती कपड़े और मसाले जैसे- काली मिर्च, अदरक, इलायची, दालचीनी और हल्दी के साथ-साथ हाथी दाँत के उत्पाद, मोती और बहुमूल्य रत्न आदि प्रमुख थे।
  • व्यापारियों द्वारा आयातित वस्तुओं में घोड़ा, सोना, चाँदी और मीठी शराब आदि प्रमुख थे।

संगम युग का अंत

  • तीसरी शताब्दी के अंत तक संगम काल धीरे-धीरे पतन की तरफ अग्रसर होता गया।
  • तीन सौ ईस्वी पूर्व से छह सौ ईस्वी पूर्व के बीच कालभ्रस (Kalabhras) ने तमिल देश पर कब्ज़ा कर लिया था, इस अवधि को पहले के इतिहासकारों द्वारा एक अंतरिम या 'अंधकार युग' कहा जाता था।
  • साभार -    https://www.drishtiias.com/hindi/to-the-points/paper1/sangam-age-1

Saturday, August 28, 2021

पूस की रात- योगेन्द्र किसलय (वातायन पत्रिका ,वर्ष 19,अंक 10,1980-81)

 

पूस की रात- योगेन्द्र किसलय

(वातायन पत्रिका ,वर्ष 19,अंक 10,1980-81)

पूस की रात ' ' कफ़न ' की भांति प्रेमचन्द के परिपक्व और अधिक आशयी मोड़ की कहानी है । छोटे से कथानक में एक सम्पूर्ण समाज की मनोदशा । चलते फिरते केवल तीन अत्यन्त मामूली पात्र हल्कू , मुन्नी ( हल्कू की पत्नी ) और जबरा ( हल्कू का कुत्ता ) । परिवेश ग्रामीण और समस्या पैसे - कपड़ों का अभाव तथा शरीर को काटने - निगलने वाला शीत । समाधान - भाड़ में जाए खेती वेती- " रात की ठंड में यहां सोना तो न पड़ेगा । ' ' मुन्नी मना करती है लेकिन सहना की गालियों से बचने के लिए जान काट - काट कर कंबल खरीदने के लिए बचाए तीन रुपये मजबूरन हल्कू सहना को दे देता है । पूस की अंधेरी रात और हड़कम्प जाड़ा । खेत की रखवाली पर तैनात हल्कू को खेत की कम , नींद व शीत से बचाव की चिंता अधिक है । मगर नींद आने का प्रश्न ही नहीं उठता । आठ चिलम पीने के बाद भी शरीर में गर्मास नहीं आती । " यह रांड पछुआ न जाने कहां से बरफ लिए आ रही है । " तभी हल्कू को वर्ग - भेद का ज्ञान होता है , अपनी असहायता तथा ग़रीबी का भी । वह एकालाप करता है : यह खेती का मजा है ! और एक - एक भगवान ऐसे पड़े हैं , जिनके पास जाड़ा जाए तो गर्मी से घबराकर भागे ! मोटे - मोटे गद्दे , लिहाफ़ , कम्बल ! मजाल है , जाड़े का गुज़र हो जाए । तक़दीर की खूबी है । मजूरी हम करें मजा दूसरे लूटें ! ' ' सुविधा भोगी वर्ग के खिलाफ़ ऐसे वाक्य प्रेमचन्द अपने सर्वहारा पात्रों के मुँह से बुलवाते रहे हैं जिनमें स्वयं उनकी वैचारिकता अधिक झलकती है । लेकिन यहाँ हल्का का उपालम्भ संयत है , परिस्थिति के अनुकूल । ठंड उसे कलपा रही है , और उसे फ़िक्र कुत्ते की है ! दरअसल इस फ़िक में उसे अपनी ही फ़िक है । यही बारीक़ विशेषता है लेखक की । हल्क ठंड भगाने के जुगाड़ करता है । कुत्ते के मुँह की गर्मी लेता है , चिलम पीता है , करवटें बदलता है और जब ठंड पर कोई वश  नहीं चलता तो जबरा को अपनी गोद में चिपटा लेता है । स्वान प्रेम की यह चरम परिणति हल्कू के आदमी को जाग्रत करती है , ठीक उसी प्रकार जैसे पाग़ल किंग लिअर विपन्न स्थिति में मामूली आदमियों की पीड़ा को अपनी आहतावस्था से कहीं अधिक तरजीह देता है । जानवर जानवर है , आदमी की गोद में कब तक लेटे ? उसका स्थान वहाँ नहीं है , और फिर प्रेमचन्द का जबरा अपनी ' ड्यूटी ' के प्रति हल्कू से कहीं अधिक जागरूक है , यानी कुत्ता ऐसे आदमी से अच्छा है । किसी जानवर की आहट पाते ही वह हल्कू की गोद से निकल भागता है , भूकता है । उसे चैन नहीं है क्योंकि कर्तव्य हृदय में अरमान की भांति उछल रहा है । "

 हल्कू आम के बगीचे से सूखी पत्तियाँ इकट्ठी करता है , अलाव बनाकर तापता है । इस सारे उपक्रमों में उसे खेत की रखवाली को कोई चिंता नहीं है । क्यों ? यही कहानी का मूल है । एक आदिम जंगली की तरह हल्कू अलाव के ऊपर से कूदता - फांदता है ताकि शरीर में ऊर्जा आए । इसके बाद कहानी का आशययुक्त ' क्लाइमेक्स ' है सावधानी से वणित , पूर्णतः स्वाभाविक । कहीं कोई थोपे हुए चमत्कार जैसी बात नहीं । हल्कू अलाव की गर्म राख के पास बैठा है । उधर जवान खेत में नीलगायों का झुंड घुस आया है । जबरा निरन्तर भौंके जा रहा है , लेकिन आलस और अकमर्णयता का शिकार हल्क अपनी जगह से नहीं उठता । वह जानता है कि खेत में नीलगायें ही हैं और वे खेत तबाह कर रही हैं । वह अपनी जगह बैठा - बैठा बस एक बार ' होलि - होलि ' करता है जैसे इतनी - सी चौकसी और चेतावनी से शत्रु भाग जाएगा । यहाँ तक कि वह भ्रम पालकर स्वयं को आश्वस्त करता है कि जबरा के रहते कोई जानवर नहीं आ सकता ।

सुबह , चारों ओर धूप खिलने के वक्त मुन्नी उसे उठाकर कहती है : सारे खेत का सत्यानाश हो गया । भला ऐसा भी कोई सोता है ! तुम्हारे यहां मईया डालने से क्या हुआ ? " बजाय अफ़सोस करने के या शर्मिन्दा होने के हल्कू बहाना बनाता है : " मैं मरते - मरते बचा , तुझे अपने खेत की पड़ी है । पेट में ऐसा दर्द हुआ कि मैं ही जानता हूं । " खेत की दुर्दशा पर मुन्नी उदास है । वह कहती है कि अब मालगुजारी भरने के लिए मजूरी करनी पड़ेगी । लेकिन हल्कू को राहत है क्योंकि उसे अब रात की ठंड में यहाँ सोना तो नहीं पड़ेगा । " अत्यन्त मामूली घटना वाली इस तीखी व आशयात्मक कहानी का निष्कर्ष क्या निकाला जाये ?

 डा ० हरदयाल के शब्दों में " यथार्थ के ध्रुवांत " की कहानी अथवा " कठोर सत्य " शोषण से भरे समाज के नकारात्मक मूल्यों की ओर एक क़दम । सुरेश सेठ के अनुसार " नखशिख से दुरुस्त और यथार्थ की चेतना को एक मार्मिक तीखेपन के साथ उद्घटित करती हुई यह कहानी आज को किसी भी आधुनिक , सर्वहारा का नारा लगाने वाली , कहानी को दो - चार पाठ पढ़ा सकती है । " डा ० मदन गुलाटी इसे प्रेमचन्द की बेहतरीन कहानियों में से एक मानते है क्योंकि यह यथार्थ का एक नया हाशिया खोलती है । " जहाँ तक घोर यथार्थ अथवा " कठोर सत्य " का प्रश्न है सभी समालोचक एक मत हैं , क्योकि ' कफ़न ' की भांति ' पूस की रात ' भी यथार्थ के नये पृष्ठ खोलती है ।

लेकिन यह यथार्थ लेखक के लिए अत्यन्त पीड़ा व निराशा का यथार्थ है । यह गौरवन्वित यथार्थ नहीं है क्योंकि इसमें पलायन अन्तनिहित है , ऐसा पलायन जो क्रांति को पीछे धकेलता है और सर्वहारा जिन्दगी में कोई ठोस परिवर्तन नहीं ला सकता । डा ० हरदयाल व सुरेश सेठ सोये हुए कुत्ते को मृत दिखते हैं , शायद हल्कू की पत्नी के इस संकेत के आधार पर कि " .. और जबरा मडैया के नीचे चित्त लेटा है मानो प्राण ही न हों । " प्रतीकात्मक रूप से मृत तो हल्कू है , जबरा नहीं । चित लेटा जबरा क्या नींद के वक्त भी नींद न ले ? उसे नील - गायों से घायल होकर मरा हुआ , कैसे समझ लिया गया ? रात - भर वह चौकसी करता रहा , भौंकता रहा शायद झपटा - लड़ा भी , लेकिन उसका मालिक भ्रमों व आलस की चादर ओढ़े अपनी जगह से हिला तक नहीं । ऐसे में जबरा की कर्तव्यपरायणता तथा जुझारूपन किस काम की ? व्यंग्य इसी में निहित है कि धरती - पुत्र से तो श्रेष्ठ जबरा कुत्ता है जो रात - भर आततायियों से संघर्ष करता रहा । लेकिन जिसके लिए वह संघर्ष कर रहा था वही अकर्मण्य है , अपनी सम्पदा ,यहाँ तक कि अपने अस्तित्व के प्रति भी नितान्त उदासीन । मैं सोचता हूं जिस प्रकार फ्रॉस्ट की प्रसिद्ध कविता " स्टापिंग बाइ वुड्स ऑन ए स्नोई ईवनिंग " में सबसे समझदार पात्र घोड़ा है , उसी प्रकार ' पूस की रात ' का सबसे समझदार पात्र जबरा है । फॉस्ट की कविता में अपने घोड़े की बात मालिक समझ जाता है जबकि ' पूस की रात ' में हल्क अपने कुत्ते के संघर्ष को नहीं समझता है या समझकर भी उसे नजर अन्दाज कर देता है । सुरेश सेठ के मतानुसार हल्कू इसलिए नहीं उठता कि " गरीबी एक फ़ाजिल होती है । "

प्रेमचन्द निश्चित यह नहीं कहना चाहते । इन यथार्थपरक कहा नियों के मोड़ पर आते - आते प्रेमचन्द का विश्वास डगमगा गया है । उनका लेखक जबरा की भांति कब तक शोषण के विरुद्ध युद्ध - रत रहे जब कि जिन के सिवाय वे लोगों के लिए यह युद्ध है वे स्वयं गाफ़िल हैं , निकम्मे हैं ? कतिपय बहानों कुछ नहीं गढ़ सकते । ऐसे लोगों के लिए जबरा भौंकते - भौंकते थक कर सो जाता है , और लेखक भी वैसी ही स्थिति में आ जाता है । निठल्लेपन , कामचोरी , आलस और अपने दायित्वों से पलायन का यह तीक्ष्ण सत्य अथवा दंश ' कफन ' में भी है । इस परिप्रेक्ष्य में ' पूस की रात ' तथा ' कफन ' को समान नजरिये के साथ पढ़ा जा सकता है । ' कफ़न ' के घीसू तथा माधव का प्रतिरूप ही है ' पूस की रात , का हल्कू । बहुत खुलकर प्रेमचन्द हल्कू पर प्रहार करते हैं : " अकर्मण्यता ने रस्सियों की भांति उसे चारों तरफ से जकड़ रखा था । " दोनों कहानियों में मौजमारू निकम्मे लोग हैं , दोनों कहानियों में पलायन है , दोनों कहानियों में नशा है , और दोनों कहानियों में लेखक का आक्रोश है , थकान और संभवतः हार भी । ऐसे सर्वहारा वर्ग के लिए लेखक कब तक अपना अभियान जारी रखे ? कब तक जबरा उनके लिए भोंके ? घीसू और हल्कू नयी चेतना के बड़े - बड़े वाक्य तो बोलते हैं , लेकिन उन्हें कर गुजरने के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं । कोई उन्हें परोसी हुई खिला दे या कोई युग को बदल दे जिसमें वे चैन से खा - पी सकें और शीत से न ठिठुरें । ये पात्र प्रेमचन्द के आदर्श थे , लेकिन इन्होंने ही उन्हें मोह - भंगित किया । जो लड़ाई प्रेमचन्द उनके लिए लड़ रहे थे उसे उनकी अकर्मण्यता ने धूल में मिला रखा था । ऐसी स्थिति में माधव की घर वाली को कफ़न नहीं मिलेगा और हल्कू का खेत लुटकर रहेगा । उस किसान से कैसी और कब तक सहनुभूति जो अपने खेत की रखवाली न कर सके और ऊपर से खुश हो ? विडम्बना तो यह है कि खेती वह संभाल नहीं पाया और मजूरी वह कह कर नहीं पायेगा । नीलगायें और शीत तो महाजनी सभ्यता या शोषण के प्रतीक हैं जिनके आगे प्रेमचन्द या भारत का हल्कू घुटने टेक देता है । उसकी कायरता का कितना क्षोभ रहा होगा प्रेमचन्द के चिन्तन में ?

 ' शतरंज के खिलाड़ी ' में भी यही क्षोभ है । वहाँ देश लुट रहा है , और यहाँ खेत ! घीसू , माधव और हल्कू की लाचारी उनकी मनोवृत्ति बन गई है , और मनो वृत्ति बड़ी मुशकिल से जाती है । पूरी कहानी में प्रेमचन्द ने एक गाली का प्रयोग किया है- " रांड पछुआ " जो अपनी जगह उपयुक्त है । हाँ ! यह समझ में नहीं आता कि जब हल्कू जबरा से बातें करता है तो बड़ी सभ्यतापूर्ण भाषा का प्रयोग करता है । कहीं भी उसके लिए तू - तड़ाक नहीं । भाषा में प्रवाह है , वही परिचित सादगी । हां ! जब यह पढ़ने को मिलता है : अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था , " या " अन्धकार के उस अनन्त सागर में " तो लगता है प्रेमचन्द लिख नहीं रहे , भाषा गढ़ रहे हैं । संभवतः यह स्पष्ट करने के लिए कि वे ' चेस्ट ' हिन्दी से सुपरिचित हैं । सायास हिन्दी उन्हें रास नहीं आती थी । शेष सब सहज है । ग्रामीण अंचल से अनेक शब्द जैसे ' हार ' , ' गाढ़े ' की ' चादर चिचोड़ ' , ' दोहर ' , ' पछुआ ' ' टप्प ' आदि प्रेमचन्द को अपनी जमीन से जोड़ते हैं । ' पूस की रात ' प्रेमचन्द के मोह - भंग की कहानी है , आक्रोश की भी । ऐसी कहानियों पर मौसमी आन्दोलनों के रेलों का कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता । वे आन्दोलन को बल दे सकती हैं ।