Monday, December 30, 2024

सृजनात्मक लेखन-मीडिया लेखन




 





सृजनात्मक लेखन

सृजनात्मक लेखन एक प्रकार का लेखन है जिसमें लेखक अपनी कल्पना, रचनात्मकता, और व्यक्तिगत अनुभवों को व्यक्त करता है। इसमें साहित्यिक अभिव्यक्ति, कल्पना, रचनात्मकता, व्यक्तिगत अनुभव, और साहित्यिक शैली का महत्व होता है।


1. साहित्यिक अभिव्यक्ति: सृजनात्मक लेखन में लेखक अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करता है।

2. कल्पना और रचनात्मकता: सृजनात्मक लेखन में लेखक नई और अनोखी कहानियाँ बनाता है।

3. व्यक्तिगत अनुभव: सृजनात्मक लेखन में लेखक अपने जीवन के अनुभवों को साझा करता है।

4. साहित्यिक शैली: सृजनात्मक लेखन में लेखक अपनी लेखन शैली को विकसित करता है।


मीडिया लेखन

मीडिया लेखन एक प्रकार का लेखन है जिसमें लेखक दर्शकों को जानकारी प्रदान करता है। इसमें संचार, जानकारी, व्यावसायिक उद्देश्य, दर्शकों का ध्यान, और समयबद्धता का महत्व होता है।

1. संचार और जानकारी: मीडिया लेखन में लेखक दर्शकों को जानकारी प्रदान करता है।

2. व्यावसायिक उद्देश्य: मीडिया लेखन में लेखक व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए लिखता है।

3. दर्शकों का ध्यान: मीडिया लेखन में लेखक दर्शकों को आकर्षित करने के लिए लिखता है।

4. समयबद्धता: मीडिया लेखन में लेखक समय पर लिखने के लिए दबाव में होता है।

Monday, March 20, 2023

मधुप गुनगुनाकर कह जाता (जय शंकर प्रसाद)

 कविता की व्याख्या सुनने के लिए लिंक को क्लिक करें :-

https://youtu.be/oWXvOqTK0-o


मधुप गुनगुनाकर कह जाता 

जय शंकर प्रसाद

मधुप गुनगुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
मुरझा कर गिर रही पत्तियां देखो कितनी आज घनी

          इस गंभीर अनंत नीलिमा में अस्संख्य जीवन-इतिहास-
          यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास.

तब भी कहते हो-कह डालूं दुर्बलता अपनी बीती !
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे – यह गागर रीती.

          किन्तु कहीं ऐसा ना हो की तुम ही खाली करने वाले-
          अपने को समझो-मेरा रस ले अपनी भरने वाले

यह विडम्बना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं
भूलें अपनी, या प्रवंचना औरों की दिखलाऊं मैं

          उज्जवल गाथा कैसे गाऊं मधुर चाँदनी रातों की
          अरे खिलखिला कार हसते होने वाली उन बातों की

मिला कहाँ वो सुख जिसका मैं स्वप्न देख कर जाग गया?
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया

          जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में
          अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में

उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पन्था की
सीवन को उधेड कर देखोगे क्यों मेरी कन्था की?

          छोटे-से जीवन की कैसे बड़ी कथाएं आज कहूँ?
          क्या ये अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?

सुनकर क्या तुम भला करोगे-मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं- थकी सोई है मेरी मौन व्यथा

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Tuesday, December 20, 2022

उठ उठ री लघु लघु लोल लहर

 https://youtu.be/FtviD6IXJMQ

व्याख्या सुनने के लिए लिंक को क्लिक करें।


उठ उठ री लघु लोल लहर!
करुणा की नव अंगड़ाई-सी,
मलयानिल की परछाई-सी
इस सूखे तट पर छिटक छहर!

शीतल कोमल चिर कम्पन-सी,
दुर्ललित हठीले बचपन-सी,
तू लौट कहाँ जाती है री
यह खेल खेल ले ठहर-ठहर!

उठ-उठ गिर-गिर फिर-फिर आती,
नर्तित पद-चिह्न बना जाती,
सिकता की रेखायें उभार
भर जाती अपनी तरल-सिहर!

तू भूल न री, पंकज वन में,
जीवन के इस सूनेपन में,
ओ प्यार-पुलक से भरी ढुलक!
आ चूम पुलिन के बिरस अधर!

इस वीडियो में इतनी कविता की व्याख्या दी गई है। इसके आगे वाले अंश की व्याख्या अगली कड़ी में। 

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