Friday, September 3, 2021

तमिल भाषा और साहित्य

 तमिल भाषा और साहित्य

तमिल भाषा और साहित्य

तमिलों की भाषा को तमिल भाषा तथा इस भाषा में लिखे साहित्य को तमिल साहित्य कहा जाता है। यह भाषा और इसे बोलने वाले लोग भी तमिल कहे जाते हैं। यह द्रविड़ भाषा परिवार की सर्वाधिक प्रचीन भाषा है और इस तरह इसका साहित्य भी इस परिवार का सबसे पुराना साहित्य है। यह तमिल नाडु के रहने वाले लोगों की भाषा है, ऐसा कहना उचित नहीं क्योंकि आज का तमिल प्रदेश बहुत छोटा है, जबकि प्राचीन तमिल प्रदेश की सीमा काफी बड़ी थी। तोल्गाप्पियम् नामक तमिल ग्रंथ में प्रचीन सीमा उत्तर में तिरूपति तथा दक्षिण में कुमरी नदी मानी गयी है। उस समय कुमरी नदी तथा पहरुली नदी के बीच तमिल के 49 देश विद्यमान थे। सागर-प्रलयों में तमिल का सारा विशाल भूभाग विलीन हो गया। इसका विवरण शिलप्पदिकारम् नाक प्राचीन महाकाव्य की टीका में मिलता है। तमिल का तुलनात्मक व्याकरण लिखने वाले काल्डवेल ने अपने ग्रंथ में तमिल प्रदेश की सीमा समस्त कर्नाटक, पूर्व और पश्चिम घाट के नीचे पालघाट से लेकर कुमारी अन्तरीप तथा उत्तर में बंगोपसागर के उपकूल तक 60,009 वर्ग मील में फैली बतायी। अनेक विद्वानों का मत है कि ईसा से अनेक शताब्दियों पूर्व तमिलभाषी प्रदेश पूर्व में जावा द्वीप से लेकर दक्षिण में अफ्रीका तक फैला था। आज यह तमिलनाडु तथा श्रीलंका के कुछ भागों की जन-भाषा है।

तमिल भाषा कितनी पुरानी है इसपर मतभेद हैं परन्तु इस बात में कोई मतभेद नहीं कि संस्कृत, ग्रीक, तथा लैटिन आदि भाषाओं की तरह यह अति प्राचीन तथा सम्पन्न भाषा है। यह भाषा आज भी सामान्य व्यवहार में है जबकि अन्य प्राचीन भाषाएं ग्रन्थों तक ही सिमटकर रह गयी हैं। तमिल ईसा पूर्व कई सौ वर्ष पहले से ही सुसंस्कृत और सुव्यवस्थित है।



तमिल वाङमय का एक प्रामाणिक ग्रंथ है तोल्गाप्पियम्। यह व्याकरण का ग्रंथ है जो संस्कृत के पाणिनि के व्याकरण अष्टाध्यायी से भी पुराना है। अर्थात् ईसा पूर्व 400 के पहले का।

तमिल के महान विद्वान राघवय्यंगार के अनुसार तमिल लिपि का सम्बंध प्राचीन मिस्री लिपि से है। भारत की यही एक भाषा है जिसे ब्राह्मी लिपि से नहीं जोड़ा जाता। इसकी वर्णमाला में 12 स्वर, 18 व्यंजन, तथा एक विसर्ग सदृश अर्धस्वर है। अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में यह वर्णमाला सबसे छोटी है।

इरैयनाकलवियलुरै नामक ग्रंथ ने तीन कविसंघों का वर्णन है। प्रथम कविसंघ ईसा पूर्व 9950 से ईसा पूर्व 5550 तक 4400 वर्षों का है। इसमें 89 कवि थे। इस काल का प्रमुख ग्रन्थ है अगत्तियम् । यह व्याकरण ग्रंथ था जो आज उपलब्ध नहीं है। इसमें 12000 सूत्र थे तथा इसे तमिल का आलोचनात्मक ग्रंथ माना जाता है। इस काल के अन्य प्रमुख ग्रंथ थे - परिपाडल, मुदुनारै, मुदुगुरुकु, तथा कलवियलुरै।



तमिल साहित्य का संवर्धन पाण्डिय राजाओं के संरक्षण में हुआ। उनकी राजधानी दक्षिण मदुरा थी जो सागर में विलीन हो गयी। उसके बाद उन्होंने अपनी राजधानी कपाटपुरम् नामक स्थान पर बनायी, तथा वहां दूसरे कविसंघ की स्थापना की। इसमें 59 सदस्य थे। इस संघ ने लगभग 3700 वर्षों तक साहित्य रचना की। यह संघ ईसा पूर्व 1850 में समाप्त हो गया जिसका कारण सागर की उथल-पुथल ही थी। इस काल के प्रमुख ग्रंथ हैं - तोलगाप्पियम्, महापुराणा, इसैनुणुक्कम्, तथा भूतपुराणम्।

उसके बाद वर्तमान मदुरा में तीसरे कविसंघ की स्थापना हुई। इसमें नक्कीरर एक प्रमुख कवि थे। कुल सदस्यों की संख्या 49 थी। यह संघ भी 1850 वर्षों तक ही रहा। इसके खत्म होने का कारण अज्ञात है।



पहले कविसंघ की कोई रचना आज उपलब्ध नहीं है। दूसरे कविसंघ की केवल एक रचना तोलगाप्पियम् ही उपलब्ध है जिसके चरयिता हैं अगस्त्य मुनि के शिष्य तोलगाप्पियर। तोलगाप्पियम् अद्भुत व्याकरण ग्रन्थ है तथा ऐन्द्र व्याकरण से प्रभावित है। तीसरे कविसंघ की अनेक रचनाएं उपलब्ध हैं। उन रचनाओं में वर्णित अनेक मन्दिर तथा मूर्तियां आज भी हैं। इस काल के प्रमुख काव्य संग्रह हैं - एट्टुत्तोगे (आठ संग्रह), पत्तुपाटटु (दस कविताएं) तथा पदिनेण्कील्कणक्कु (अट्ठारह लघु कविता संग्रह)। इनमें श्रृंगार तथा वीर रस का बाहुल्य है। प्रकृति वर्णन भी इनकी विशेषता है। एक प्रसिद्ध ग्रंथ है तिरुक्कुरल जिसमें धर्म, अर्थ, और काम के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। संसार की किसी भी भाषा में धर्म, अर्थ, और काम की इतनी सजीव, सरल, सुन्दर, तथा संक्षिप्त व्याख्या नहीं मिलती। इसके कवि हैं संत तिरुवल्लुवर। इसमें कुल 1330 दोहे हैं। इस संत की महानता यह है कि विभिन्न धर्मों के अनुयायी इन्हें अपने-अपने धर्म का - शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन और यहां तक कि ईसाई मानते हैं तथा प्रमाण के रूप में तिरूक्कुरल के दोहे उद्धृत करते हैं।



तमिल साहित्य के कालों का विभाजन इस प्रकार है - संघपूर्व काल, संघ काल, संघोत्तर काल, भक्ति काल, कम्बन काल, मध्य काल तथा आधुनिक काल।

संघोत्तर काल में तमिल के प्रमुख महाकाव्यों की रचना हुई। इस काल के पांच सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य हैं - शिलप्पदिकारम्, मणिमेकलै, जीवक-चिन्तामणि, बलयापदि, तथा कुण्जलकेशि। लगभग 600 ईस्वी तक यह काल चला।

600
ईस्वी के आसपास से भक्ति काल प्रारम्भ हुआ। इस दौरान शैव तथा वैष्णव भक्ति रचनाएं प्रचुर मात्रा में हुई। बारह आलवार संत विभिन्न जातियों से हुए जिनकी रचनाओं को नालायिरदिव्यप्रबन्धम् कहा गया। ये वैष्णव थे। इस ग्रन्थ में 4000 पद्य हैं। मन्दिरों में आज भी इनकी रचनाएं गायी जाती हैं। इन्हीं आलावरों में एक आण्डाल नामक एक प्रसिद्ध भक्तिनी हुई। इनका विवाह भगवान विष्णु से हुआ बताया जाता है। आण्डाल के गीतों के संग्रह 'तिरूप्पावै' तथा 'नाच्चियार तिरूमोलि' नाम से प्रसिद्ध हैं।

भक्ति काल में अनेक प्रबंध काव्यों की रचना हुई जिसके कारण इसे प्रबंध काल भी कहा जाता है। प्रमुख प्रबंध काव्यों में शामिल हैं - पेरियपुराण, कम्बनरामायण, तथा नलबेन्वा। कम्बन इस काल के प्रमुख कवि हैं इसलिए इसे कम्बन काल भी कहा जाता है। कम्बन रामायण 12वीं सदी में लिखा गया जिसमें 12000 पद्य हैं। इसमें वृत्तम नामक छन्द का प्रयोग किया गया है तथा नाटकीयता भी है। तमिल काव्य परम्परा का चरमोत्कर्ष इस ग्रन्थ में है।



13
वीं सदी के बात 200 वर्षों तक टीका काल रहा क्योंकि इस दौरान पुराने ग्रंथों की टीकाएं ही अधिक लिखी गयीं, तमिल साहित्य में उनका ही प्रभुत्व रहा। नच्चिनाकिनीयार को इस काल का सर्वश्रेष्ठ टीकाकार माना जाता है। यह तमिल साहित्य का मध्य काल था जो 17वीं सदी तक चला।

18
वीं सदी से तमिल साहित्य का आधुनिक काल आया। इसमें गद्य का विकास हुआ। ईसाई मिशनरी आये जिन्होंने तमिल में बहुत काम किया। तमिल के प्रसिद्ध लेखक वेदनायकम् पिल्लै ने हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाया तथा तमिल में अनेक ग्रंथों का निर्माण किया। सर्वसमरसकीर्तन, नीतिनूल, तथा पेणमणिमालै इनके प्रमुख ग्रंथ हैं। ईसाइयों ने तमिल भाषा का सरल व्याकरण तथा शब्दकोश बनाया। बीरमामुनि नामक ईसाई संत (फादर वैस्की) ने तमिल में तेम्बावाणी काव्य लिखा जिसमें ईसा के बारे में बताया गया है। इनका व्यंग्य प्रधार ग्रंथ है परमार्थ गुरूकदै। इस युग के मुसलमान लेखकों में प्रसिद्ध हैं मुहम्मद इब्राहिम, मुहम्मद हुसेन, नायिनार, मस्तान साहिब, गुलाब कादिर आदि।

19
वीं सदी के प्रसिद्ध गद्यलेख हैं आरुभुगनावलर। इस सदी में नाटक, गद्य, उपन्यास, कहानी और गीत प्रचुर मात्रा में लिखे गये। संस्कृत के अनेक प्रमुख ग्रंथों का भी तमिल में अनुवाद हुआ। इस काल के प्रमुख लेखक हैं - नागनाद पडिंदर, दामोदरम् पिल्लै, मीनाक्षीसुन्दरम् आदि। लोकगीतों की दृष्टि से गोपाल कृष्ण भारतीय की रचना नन्दनचरित्र भी उल्लेखनीय है। 19 वीं सदी के अन्त में लिखे गये प्रसिद्ध उपन्यास हैं - प्रतापमुदालियारचरित्रम्, कमलाम्बालचरित्रम्, पदमावतीचरित्रम्, तथा जटावल्लवर।

20
वीं शती में अंग्रेजी का प्रभाव हुआ। तमिल में नयी भाषा शैली का सूत्रपात हुआ। आधुनिक ढंग के साहित्य, नाटक, काव्य आदि की रचनाएं होने लगीं। सुन्दरम् पिल्लै ने मनोन्य णीयम् नामक काव्यनाटक की रचना की। सूर्यनानायण शास्त्री ने शेक्सपीयर की शैली का अनुकरण कर कई नाटक लिखे जिनमें मानविजय, कलावती, तथा रूपवती नामक नाटक प्रसिद्ध हैं। मुदलियार ने नाटकों की कमी को पूरा करने के लिए 80 नाटक लिखे।

सब्रह्मण्यम भारती इस युग के अमर कवि हैं। ये राष्ट्रवादी कवि हैं। जासूसी उपन्यास लिखने वालों में आरणी कुप्पुसामी मुदलियार तथा सामाजिक उपन्यासकारों में बडबूर डरैसामी अय्यंगार तथा रंगराज प्रसिद्ध हैं। कृष्ममूर्ति ने भी अनेक स्थायी महत्व के उपन्यास लिखे जिनमें शिवगामियिन्शपदम तथा पर्तिवनकनऊ उल्लेखनीय हैं। अन्य महत्वपूर्ण उपन्यास लेखक हुए वरदराजन, महादेवन, कण्णन, मणि, जीवा, अनुत्तमा, सरस्सती तथा गुहप्रिया।

पत्र-पत्रिकाओं के प्रसार के कारण तमिल में कहानी लेखन भी लोकप्रिय हुआ। पुराने कहानीकारों में अय्यर भारती तथा बंकटमणि प्रसिद्ध हैं। बाद के प्रमुख कहानीकार हुए राजाजी, पुदुमैप्पित्तन, अकिलन, कल्की, जीवा, राजगोपालन और पिच्चमूर्ति। इस युग के प्रमुख आलोचकों में स्वामीनाद अय्यर, राघवय्यबर, राघवय्यर, का. पिल्लै, सोमसुन्दर भारती, वैयापुरि पिल्लै, ब. वरदराजन, श्रीनिवास राघवन, सेतुपिल्लै तथा मीनाक्षीसुन्दरम् पिल्लै। ज्ञानसम्बंधन भी आधुनिक आलोचकों में उच्चस्तरीय माने जाते हैं। निबन्ध लेखकों में कल्याणसुन्दर मदलियार अद्वितीय माने जाते हैं।


संगम युग

परिचय

दक्षिण भारत (कृष्णा एवं तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में स्थित क्षेत्र) में लगभग तीन सौ ईसा पूर्व से तीन सौ ईस्वी के बीच की अवधि को संगम काल के नाम से जाना जाता है।

  • संगम तमिल कवियों का एक संगम या सम्मलेन था, जो संभवतः किन्हीं प्रमुखों या राजाओं के संरक्षण में ही आयोजित होता था।
  • आठवीं सदी ई. में तीन संगमों का वर्णन मिलता है। पाण्ड्य राजाओं द्वारा इन संगमों को शाही संरक्षण प्रदान किया गया।
  • ये साहित्यिक रचनाएँ द्रविड़ साहित्य के शुरुआती नमूने थे।
  • तमिल किंवदंतियों के अनुसार, प्राचीन दक्षिण भारत में तीन संगमों (तमिल कवियों का समागम) का आयोजन किया गया था, जिसे मुच्चंगम (Muchchangam) कहा जाता था।
    • माना जाता है कि प्रथम संगम मदुरै में आयोजित किया गया था। इस संगम में देवता और महान संत शामिल थे। इस संगम का कोई साहित्यिक ग्रंथ उपलब्ध नहीं है।
    • दूसरा संगम कपाटपुरम् में आयोजित किया गया था, इस संगम का एकमात्र तमिल व्याकरण ग्रंथ तोलकाप्पियम् ही उपलब्ध है।
    • तीसरा संगम भी मदुरै में हुआ था। इस संगम के अधिकांश ग्रंथ नष्ट हो गए थे। इनमें से कुछ सामग्री समूह ग्रंथों या महाकाव्यों के रूप में उपलब्ध है।

संगम साहित्य: संगम युग का विवरण देने वाला प्रमुख स्रोत

संगम साहित्य मुख्य रूप से तमिल भाषा में लिखा गया है, संगम युग की प्रमुख रचनाओं में तोलकाप्पियम्, एतुत्तौके, पत्तुप्पातु, पदिनेकिल्लकणक्कु इत्यादि ग्रंथ तथा शिलप्पादिकारम्, मणिमेखलै और जीवक चिंतामणि महाकाव्य शामिल हैं।

  • तोलकाप्पियम् के लेखक तोलकाप्पियर हैं। यह द्वितीय संगम का उपलब्ध एकमात्र प्राचीनतम ग्रंथ है। यह व्याकरण से संबंधित एक ग्रंथ है, साथ ही यह उस समय की राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की जानकारी भी प्रदान करता है।
  • एतुत्तौके (अष्ट संग्रह) एक संग्रह ग्रंथ है यह तीसरे संगम के आठ ग्रंथों का संग्रह है। ये आठ ग्रंथ निम्नलिखित हैं- नण्णिनै, कुरुन्थोकै, एनकुरुनूर, पदित्रप्पत्तु, परिपादल, कलिथौके, अहनानरु, पुरुनानरु।
  • पत्तुप्पातु (दशगीत) दस कविताओं का संग्रह है और यह तृतीय संगम का दूसरा संग्रह ग्रंथ है। ये दस कविताएँ निम्नलिखित हैं- तिरुमुरुकात्रुप्पदै, नेडनलवाडै, पेरुम्पनत्रुप्पदै, पत्तिनप्पालै, पोरुनरात्रुप्पदै, मदुरैकांचि, सिरुपानात्रुप्पदै, मुल्लैप्पातु, कुरुन्जिप्पातु, मलैपदुकदाम।
  • पदिनेकिल्लकणक्कु 18 कविताओं वाला एक आचारमूलक ग्रंथ है तथा यह तृतीय संगम साहित्य से संबंधित है। इन 18 कविताओं में महत्त्वपूर्ण कविता तमिल के महान कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर द्वारा लिखित तिरुक्कुरल है। इसे तमिल साहित्य का बाइबिल अथवा पंचम वेद भी माना जाता है।
  • शिलप्पादिकारम् ‘इलांगोआदिगल’ द्वारा और मणिमेखलै ‘सीतलैसत्तनार’ द्वारा लिखे गए महाकाव्य हैं। इन महाकाव्यों द्वारा तत्कालीन संगम समाज और राजनीति के विषय में अच्छी जानकारी प्राप्त होती है।

संगम काल के बारे में विवरण देने वाले अन्य स्रोत हैं -

  • मेगस्थनीज (Megasthenes), स्ट्रैबो (Strabo), प्लिनी (Pliny) और टॉलेमी (Ptolemy) जैसे यूनानी लेखकों ने पश्चिम तथा दक्षिण भारत के बीच वाणिज्यिक व्यापार संपर्कों के बारे में उल्लेख किया है।
  • अशोक के अभिलेखों में चोल, पाण्ड्य और चेर के बारे में बताया गया है।
  • कलिंग के खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख में तमिल राज्यों का उल्लेख है।
  • आठवीं सदी ई. में इरैयनार अगप्पोरुल के भाष्य की भूमिका में तीनों संगमो का वर्णन किया गया है।

संगम काल का राजनीतिक इतिहास

संगम युग के दौरान दक्षिण भारत पर तीन राजवंशों- चेरों, चोलों और पाण्ड्यों का शासन था। इन राज्यों के बारे में जानकारी संगम काल के साहित्यिक संदर्भों से प्राप्त की जा सकती है।

चेर

  • चेरों ने आधुनिक राज्य केरल के मध्य और उत्तरी हिस्सों तथा तमिलनाडु के कोंगु क्षेत्र को नियंत्रित किया।
  • उनकी राजधानी वांजि थी तथा पश्चिमी तट, मुसिरी और टोंडी के बंदरगाह उनके नियंत्रण में थे।
  • चेरों का प्रतीक चिह्न "धनुष-बाण" था।
  • ईसा की पहली शताब्दी के पुगलुर शिलालेख से चेर शासकों की तीन पीढ़ियों की जानकारी मिलती है।
  • चेर राजा रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार से लाभ प्राप्त करते थे। कहा जाता है कि उन्होंने ऑगस्टस का एक मंदिर भी बनवाया गया था।
  • चेरों के सबसे महान राजा शेनगुटटवन/सेंगुत्तुवन थे जिन्हें लाल या अच्छे चेर भी कहा जाता था।
  • शेनगुटटवन/सेंगुत्तुवन ने चेर राज्य में पत्तिनी (पत्नी) पूजा प्रारंभ की। इसे कण्णगी पूजा भी कहा गया।
  • वह दक्षिण भारत से चीन में दूत भेजने वाले पहले व्यक्ति थे।

चोल

  • चोलों ने तमिलनाडु के मध्य और उत्तरी भागों को नियंत्रित किया।
  • उनके शासन का मुख्य क्षेत्र कावेरी डेल्टा था, जिसे बाद में चोलमंडलम के नाम से जाना जाता था।
  • उनकी राजधानी उरैयूर (तिरुचिरापल्ली शहर के पास) थी। बाद में करिकाल ने कावेरीपत्तनम या पुहार नगर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया।
  • इनका प्रतीक चिह्न बाघ था।
  • चोलों के पास एक कुशल नौसेना भी थी।
  • चोल राजाओं में राजा करिकाल सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शासक था।
    • पत्तिनप्पालै में उनके जीवन और सैन्य अधिग्रहण को दर्शाया गया है।
    • विभिन्न संगम साहित्य की कविताओं में वेण्णि के युद्ध का उल्लेख मिलता है इस युद्ध में करिकाल ने पाण्ड्य तथा चेर सहित ग्यारह राजाओं को पराजित किया।
    • करिकाल की सैन्य उपलब्धियों ने उन्हें पूरे तमिल क्षेत्र का अधिपति बना दिया।
    • करिकाल ने अपने शासनकाल में व्यापार और वाणिज्य क्षेत्र को संपन्न बनाया।
    • करिकाल ने पुहार या कावेरीपत्तनम शहर की स्थापना की और अपनी राजधानी उरैपुर से कावेरीपत्तनम में स्थानांतरित की। इसके अतिरिक्त कावेरी नदी के किनारे 160 किमी. लंबा बांध बनवाया।

पाण्ड्य

  • पाण्ड्यों ने मदुरै से शासन किया।
  • पाण्ड्य राज्य भारतीय प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी भाग में था।
  • कोरकई इनकी प्रारंभिक राजधानी थी जो बंगाल की खाड़ी के साथ थम्परपराणी के संगम के पास स्थित थी।
  • पाण्ड्य वंश का प्रतीक चिह्न ‘मछली’ थी।
  • उन्होंने तमिल संगमों का संरक्षण किया और संगम कविताओं के संकलन की सुविधा प्रदान की।
  • शासकों ने एक नियमित सेना बनाए रखी।
  • संगम साहित्य के अनुसार, पाण्ड्य राज्य धनी और समृद्ध था।
  • पाण्ड्यों का पहला उल्लेख मेगास्थनीज ने किया है, उन्होंने इस राज्य को मोतियों के लिये प्रसिद्ध बताया था।
  • समाज में विधवाओं के साथ बुरा बर्ताव किया जाता था।
  • इस राज्य में ब्राम्हणों का काफी प्रभाव था तथा ईसा के शुरूआती शताब्दियों में पाण्ड्य रजा वैदिक यज्ञ करते थे।
  • कलभ्रस (Kalabhras) नामक जनजाति के आक्रमण के साथ उनकी शक्ति का क्षय हुआ।
  • नल्लिवकोडन संगम युग का अंतिम ज्ञात पाण्ड्य शासक था।

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संगम राजव्यवस्था और प्रशासन

  • संगम काल के दौरान वंशानुगत राजतंत्र का प्रचलन था।
  • संगम युग के प्रत्येक राजवंश के पास शाही प्रतीक था। जैसे- चोलों के लिये बाघ, पाण्ड्यों के लिये मछली और चेरों के लिये धनुष।
  • राजा की शक्ति पर पाँच परिषदों का नियंत्रण था, जिन्हें पाँच महासभाओं के नाम से जाना जाता था।
  • मंत्री (अमैच्चार), पुरोहित (पुरोहितार), दूत (दूतार), सेनापति (सेनापतियार) और गुप्तचर (ओर्रार) थे।
  • सैन्य प्रशासन का संचालन कुशलतापूर्वक किया गया जाता था और प्रत्येक शासक के साथ एक नियमित सेना जुड़ी हुई थी।
  • राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमि राजस्व था, जबकि विदेशी व्यापार पर सीमा शुल्क भी लगाया गया था।
  • युद्ध में लूटी गई संपत्ति को भी राजकोषीय आय माना जाता था।
  • डकैती और तस्करी को रोकने के लिये सड़कों और राजमार्गों की उचित व्यवस्था को बनाए रखा गया था।

संगम सोसाइटी

  • पुरुनानरु नामक ग्रंथ में चार वर्गों तुड़ियन, पाड़न, पड़ैयन और कड़म्बन का उल्लेख मिलता है।
  • पुरुनानरू नामक ग्रंथ में चार वर्गों का उल्लेख मिलता है -जैसे- शुड्डुम वर्ग (ब्राह्मण एवं बुद्धिजीवी वर्ग), अरसर वर्ग (शासक एवं योद्धा वर्ग), बेनिगर वर्ग (व्यापारी वर्ग) और वेल्लाल वर्ग (किसान वर्ग)।
  • संगम कविताओं में भूमि के पाँच मुख्य प्रकार पाए जाते हैं - मुल्लै (देहाती), मरुदम (कृषि), पालै (रेगिस्तान), नेथल (समुद्रवर्ती) और कुरिंचि (पहाड़ी)।
  • प्राचीन आदिम जनजातियाँ जैसे- थोडा, इरुला, नागा और वेदर इस काल में पाई जाती थीं।
  • एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इस युग में दास-प्रथा का आभाव था।

संगम युग के दौरान महिलाओं की स्थिति

  • संगम युग के दौरान की महिलाओं की स्थिति को समझने के लिये संगम साहित्य में काफी जानकारी उपलब्ध है।
  • महिलाओं का सम्मान किया जाता था और उन्हें बौद्धिक गतिविधियों के संचालन की अनुमति थी। ओबैयार (Avvaiyar), नच्चेलियर (Nachchellaiyar) और काकईपाडिन्यार (Kakkaipadiniyar) जैसी महिला कवयित्री थीं, जिन्होंने तमिल साहित्य में उत्कर्ष योगदान दिया।
  • महिलाओं को अपन जीवन साथी चुनने की अनुमति थी लेकिन विधवाओं का जीवन दयनीय था।
  • समाज में उच्च स्तर पर सती प्रथा के प्रचलन का उल्लेख मिलता है।

धर्म

  • संगम काल के प्रमुख देवता मुरुगन थे, जिन्हें तमिल भगवान के रूप में जाना जाता है।
  • दक्षिण भारत में मुरुगन की पूजा सबसे प्राचीन मानी जाती है और भगवान मुरुगन से संबंधित त्योहारों का संगम साहित्य में उल्लेख किया गया था।
  • संगम काल के दौरान पूजे जाने वाले अन्य देवता मयोन (विष्णु), वंदन (इंद्र), कृष्ण, वरुण और कोर्रावई थे।
  • संगम काल में नायक पाषाण काल ​​की पूजा महत्त्वपूर्ण थी जो युद्ध में योद्धाओं द्वारा दिखाए गए शौर्य की स्मृति के रूप में चिह्नित किये गए थे।
  • संगम युग में बौद्ध धर्म और जैन धर्म का भी प्रसार दिखाई पड़ता है।

संगम युग की अर्थव्यवस्था

  • कृषि मुख्य व्यवसाय था और चावल सबसे आम फसल थी।
  • हस्तकला में बुनाई, धातु के काम और बढ़ईगीरी, जहाज़ निर्माण और मोतियों, पत्थरों तथा हाथी दाँत का उपयोग करके आभूषण बनाना शामिल था।
  • संगम युग की महत्त्वपूर्ण विशेषता इसका आंतरिक और बाहरी व्यापार था।
  • सूती और रेशमी कपड़ों की कताई एवं बुनाई में उच्च विशेषज्ञता प्राप्त थी। पश्चिमी देशों में विशेष रूप से उरियुर में बुने हुए सूती कपड़ों की बहुत मांग थी।
  • पुहार शहर विदेशी व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण स्थान बन गया, क्योंकि कीमती सामान वाले बड़े जहाज़ इस बंदरगाह में प्रवेश करते थे।
  • वाणिज्यिक गतिविधि के लिये अन्य महत्वपूर्ण बंदरगाह तोंडी, मुशिरी, कोरकई, अरिकमेडु और मरक्कानम थे।
  • ऑगस्टस, टाइबेरियस और नीरो जैसे रोमन सम्राटों द्वारा जारी किये गए कई सोने और चाँदी के सिक्के तमिलनाडु के सभी हिस्सों में पाए गए हैं जो समृद्ध व्यापार का संकेत देते हैं।
  • संगम युग के प्रमुख निर्यात में सूती कपड़े और मसाले जैसे- काली मिर्च, अदरक, इलायची, दालचीनी और हल्दी के साथ-साथ हाथी दाँत के उत्पाद, मोती और बहुमूल्य रत्न आदि प्रमुख थे।
  • व्यापारियों द्वारा आयातित वस्तुओं में घोड़ा, सोना, चाँदी और मीठी शराब आदि प्रमुख थे।

संगम युग का अंत

  • तीसरी शताब्दी के अंत तक संगम काल धीरे-धीरे पतन की तरफ अग्रसर होता गया।
  • तीन सौ ईस्वी पूर्व से छह सौ ईस्वी पूर्व के बीच कालभ्रस (Kalabhras) ने तमिल देश पर कब्ज़ा कर लिया था, इस अवधि को पहले के इतिहासकारों द्वारा एक अंतरिम या 'अंधकार युग' कहा जाता था।
  • साभार -    https://www.drishtiias.com/hindi/to-the-points/paper1/sangam-age-1